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		<title>ایده یابان نواندیش - مجله‌ اینترنتی آموزشی علمی</title>
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				<item>
			<title>&#34; فایل های مقالات و پروژه ها – قسمت 17 – 8 &#34;</title>
			<link>https://mel.kowsarblog.ir/فایل-های-مقالات-و-پروژه-ها-n-قسمت-17-nn8</link>
			<pubDate>21:26:00 +0330 دوشنبه، 21 آذر 1401</pubDate>			<dc:creator>نویسنده محمدی</dc:creator>
			<category domain="main">بدون موضوع</category>			<guid isPermaLink="false">1546382@https://kowsarblog.ir/</guid>
						<description>&lt;p&gt;&amp;#8220;&lt;/p&gt;
&lt;div id=&quot;story&quot; class=&quot;story&quot; data-id=&quot;1557099313&quot; data-words=&quot;833&quot;&gt;
&lt;div&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;جدول ۳-۱۲ : میانگین توزیع فراوانی شگرد سرقت خودرو توسط پاسخ دهندگان به سوالات پرسشنامه&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;img src=&quot;https://ziso.ir/wp-content/uploads/2022/11/pics_10_50.png&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;شگرد سرقت خودرو فراوانی درصد درصد معتبر درصد تجمعی یکسره کردن برق خودرو&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;استفاده از شاه کلید&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;سرقت خودروهای روشن&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;سایر موارد&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;مجموع&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۳&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۲&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۲&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۸۵/۴۲&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۵۷/۲۸&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۵۷/۲۸&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۰۰٫۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۸۵/۴۲&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۵۷/۲۸&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۵۷/۲۸&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۰۰٫۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۸۵/۴۲&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۹۷&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۰۰٫۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۰۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;نمودار ۳-۱۲ : میانگین توزیع فراوانی شگرد سرقت خودرو توسط پاسخ دهندگان به سوالات پرسشنامه&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;فراوانی توزیع انواع شگرد سرقت خودرو در استان قم بدین صورت است که:۳ نفر معادل ۸۵/۴۲درصد مرتکبین به وسیله یکسره کردن برق خودرو و ۲ نفر از افراد معادل ۵۷/۲۸ درصد مرتکبین خودروهای روشن را سرقت نموده اند و ۲ نفر معادل ۵۷/۲۸ درصد مرتکبین سرقت با شگرهای دیگری همچون استفاده از کامپیوتر یدک نسبت به سرقت دخودرو اقدام نموده اند این در حالی است که هیچ سرقتی به وسیله شاه کلید صورت نپذیرفته است که این آمار نشانده این مطلب است که اکثر خودروهی مسروقه از خودروهای مدل پایین می‌باشد که بلحاظ امنیتی در سطح پایینی قرار دارند.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;جدول ۳-۱۳ : میانگین توزیع فراوانی شگرد سرقت منزل توسط پاسخ دهندگان به سوالات پرسشنامه&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;شگرد سرقت منزل فراوانی درصد درصد معتبر درصد تجمعی تالیور زنی&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;استفاده از شاه کلید&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;کارت زنی&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;عبور از روی دیوار&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;مجموع&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۲۸&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۲&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۵&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۸۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۷۱/۵&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۲۸/۱۴&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۰۰٫۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۸۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۷۱/۵&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۲۸/۱۴&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۰۰٫۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۸۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۷۱/۸۵&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۰۰٫۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۰۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;نمودار ۳-۱۳ : میانگین توزیع فراوانی شگرد سرقت منزل توسط پاسخ دهندگان به سوالات پرسشنامه&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;فراوانی توزیع انواع شگرد سرقت منزل در استان قم بدین صورت است که:۲۸ نفر معادل ۸۰درصد مرتکبین به وسیله تالیور زنی و ۲ نفر از افراد معادل ۷۱/۵ درصد مرتکبین از طریق کارت زنی و ۵ نفر معادل ۲۸/۱۴ درصد مرتکبین با عبور از روی دیوار اقدام به سرقت از منازل نموده اند این آمار نشان دهنده این است که تالیور زنی عمده شگرد سارقین منزل استان قم می‌باشد که اکثرا از طایفه فیوج می‌باشند که شگرد مخصوص آن ها می‌باشد.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;گفتار چهارم : بررسی عوامل بیرونی تاثیرگذار بر ایجاد انگیزه مجرمانه در سارقین&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;تاثیر دوستان ناباب فراوانی درصد درصد معتبر درصد تجمعی خیلی کم&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;کم&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;متوسط&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;زیاد&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;خیلی زیاد&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;مجموع&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۷&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۴&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۵&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۲۳&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۶۱&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۸۳/۵&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۶۶/۱۱&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۵۰/۱۲&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۶/۱۹&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۸۳/۵۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۰۰٫۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۸۳/۵&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۶۶/۱۱&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۵۰/۱۲&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۶/۱۹&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۸۳/۵۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۰۰٫۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۸۳/۵&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۴۹/۱۷&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۹۹/۲۹&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۵/۴۹&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۰۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;جدول ۳-۱۴ : میانگین تاثیر دوستان ناباب در ارتکاب سرقت توسط پاسخ دهندگان به سوالات پرسشنامه&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;نمودار ۳-۱۴ : میانگین تاثیر دوستان ناباب در ارتکاب سرقت توسط پاسخ دهندگان به سوالات پرسشنامه&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;فراوانی تاثیر گذاری عامل تاثیر گذاری دوستان ناباب بر ارتکاب جرم سرقت در بین پرسش شوندگان بدین صورت است که:۷ نفر معادل ۸۳/۵درصد خیلی کم و ۱۴ نفر از افراد معادل ۶۶/۱۱ درصد کم و ۱۵ نفر معادل ۵۰/۱۲ درصد متوسط و ۲۳ نفر از افراد معادل ۱۶/۱۹ درصد زیاد و ۶۱ نفر از افراد معادل ۸۳/۵۰ درصد بسیار زیاد تحت تاثیر دوستان ناباب قرار گرفته اند ، آمار نشانده این است که ۷۰ درصد مرتکبین اذعان داشته اند که دوستان ناباب تحت تاثیر مستقیم دوستان ناباب بوده و آنان در ارتکاب بزه تاثیر بسزایی داشته اند.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;جدول ۳-۱۵ : میانگین توزیع و فراوانی میزان التزام به واجبات شرعی توسط پاسخ دهندگان به سوالات پرسشنامه&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;التزام به واجبات شرعی فراوانی درصد درصد معتبر درصد تجمعی خیلی کم&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;کم&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;متوسط&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;زیاد&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;خیلی زیاد&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;مجموع&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۷۳&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۲۸&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۷&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۲&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۸۳/۶۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۳۳/۲۳&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۶/۱۴&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۶۶/۱&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۰۰٫۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۸۳/۶۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۳۳/۲۳&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۶/۱۴&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۶۶/۱&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۰۰٫۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۸۳/۵&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۶/۸۴&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۳۲/۹۸&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۹۸/۹۹&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۰۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;نمودار ۳-۱۵ : میانگین توزیع و فراوانی میزان التزام به واجبات شرعی توسط پاسخ دهندگان به سوالات پرسشنامه&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;فراوانی تاثیر گذاری عامل تاثیر گذاری التزام به واجبات شرعی در بین پرسش شوندگان بدین صورت است که:۷۳ نفر معادل ۸۳/۶۰ درصدخیلی کم و ۲۸ نفر از افراد معادل ۳۳/۲۳ درصد کم و ۱۷ نفر معادل ۱۶/۱۴ درصد متوسط و ۲ نفر از افراد معادل ۶۶/۱ درصد زیاد و هیچ کدام از سارقین التزام خیلی زیاد به انجام واجبات شرعی نداشته اند ، آمار نشانده این است که اعتقاد و التزام به انجام واجبات شرعی تاثیر مستقیم بر جلوگیری از ارتکاب بزه در بین سارقین داشته است.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;جدول ۳-۱۶ : میانگین توزیع فراوانی نقش قانون و مجازات معینه در جهت پیشگیری از جرم از دیدگاه پاسخ دهندگان به سوالات پرسشنامه&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;نقش قانون در پیشگیری فراوانی درصد درصد معتبر درصد تجمعی خیلی کم&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;کم&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;متوسط&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;زیاد&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;خیلی زیاد&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;مجموع&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۵۹&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۳۳&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۷&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۹&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۲&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۶/۴۹&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۵/۲۷&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۶/۱۴&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۵/۲&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۷۵/۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۶/۴۹&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۵/۲۷&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۶/۱۴&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۵/۲&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۷۵/۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۶/۴۹&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۶۶/۷۶&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۸۲/۹۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۶/۹۹&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۰۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱۰۰٫۰&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;نمودار ۳-۱۶ : میانگین توزیع فراوانی نقش قانون و مجازات معینه در جهت پیشگیری از جرم از دیدگاه پاسخ دهندگان به سوالات پرسشنامه&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;فراوانی تاثیر گذاری عامل نقش قانون و مجازات معینه در پیشگیری از وقوع جرم از دید پرسش شوندگان بدین صورت است که:۵۹ نفر معادل ۱۶/۴۹درصد خیلی کم و ۳۳ نفر از افراد معادل ۵/۲۷ درصد کم و ۱۷ نفر معادل ۱۶/۱۴ درصد متوسط و ۹ نفر از افراد معادل ۵/۲ درصد زیاد و ۲ نفر معادل ۷۵/۰ در صد افراد دارای نقش قانون را در پیشگیری از وقوع جرم خیلی زیاد می‌دانستند ، آمار نشانده این است که تنها تعداد قلیلی از سارقین قانون و مجازات را در پیشگیری از جرم دارای نقش برجسته ای دانسته اند شاید این امر به نحوه اجرای قانون نیز برگردد.&lt;/p&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&amp;#8220;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;item_footer&quot;&gt;&lt;p&gt;&lt;small&gt;&lt;a href=&quot;https://mel.kowsarblog.ir/فایل-های-مقالات-و-پروژه-ها-n-قسمت-17-nn8&quot;&gt;مطلب اصلی&lt;/a&gt; در &lt;a href=&quot;http://kowsarblog.ir/&quot;&gt;کوثربلاگ &lt;/a&gt;ارسال شده است.&lt;/small&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;</description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;</p>
<div id="story" class="story" data-id="1557099313" data-words="833">
<div>
<p> </p>
<p>جدول ۳-۱۲ : میانگین توزیع فراوانی شگرد سرقت خودرو توسط پاسخ دهندگان به سوالات پرسشنامه</p>
<p><img src="https://ziso.ir/wp-content/uploads/2022/11/pics_10_50.png" /></p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p>شگرد سرقت خودرو فراوانی درصد درصد معتبر درصد تجمعی یکسره کردن برق خودرو</p>
<p> </p>
<p>استفاده از شاه کلید</p>
<p> </p>
<p>سرقت خودروهای روشن</p>
<p> </p>
<p>سایر موارد</p>
<p> </p>
<p>مجموع</p>
<p>۳</p>
<p> </p>
<p>۰</p>
<p> </p>
<p>۲</p>
<p> </p>
<p>۲</p>
<p>۸۵/۴۲</p>
<p> </p>
<p>۰</p>
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<p>۵۷/۲۸</p>
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<p>۵۷/۲۸</p>
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<p>۱۰۰٫۰</p>
<p>۸۵/۴۲</p>
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<p>۰</p>
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<p>۵۷/۲۸</p>
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<p>۵۷/۲۸</p>
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<p>۱۰۰٫۰</p>
<p>۸۵/۴۲</p>
<p> </p>
<p>۰</p>
<p> </p>
<p>۹۷</p>
<p> </p>
<p>۱۰۰٫۰</p>
<p> </p>
<p>۱۰۰</p>
<p>نمودار ۳-۱۲ : میانگین توزیع فراوانی شگرد سرقت خودرو توسط پاسخ دهندگان به سوالات پرسشنامه</p>
<p> </p>
<p>فراوانی توزیع انواع شگرد سرقت خودرو در استان قم بدین صورت است که:۳ نفر معادل ۸۵/۴۲درصد مرتکبین به وسیله یکسره کردن برق خودرو و ۲ نفر از افراد معادل ۵۷/۲۸ درصد مرتکبین خودروهای روشن را سرقت نموده اند و ۲ نفر معادل ۵۷/۲۸ درصد مرتکبین سرقت با شگرهای دیگری همچون استفاده از کامپیوتر یدک نسبت به سرقت دخودرو اقدام نموده اند این در حالی است که هیچ سرقتی به وسیله شاه کلید صورت نپذیرفته است که این آمار نشانده این مطلب است که اکثر خودروهی مسروقه از خودروهای مدل پایین می‌باشد که بلحاظ امنیتی در سطح پایینی قرار دارند.</p>
<p> </p>
<p>جدول ۳-۱۳ : میانگین توزیع فراوانی شگرد سرقت منزل توسط پاسخ دهندگان به سوالات پرسشنامه</p>
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<p>شگرد سرقت منزل فراوانی درصد درصد معتبر درصد تجمعی تالیور زنی</p>
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<p>استفاده از شاه کلید</p>
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<p>کارت زنی</p>
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<p>عبور از روی دیوار</p>
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<p>مجموع</p>
<p>۲۸</p>
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<p>۰</p>
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<p>۲</p>
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<p>۵</p>
<p>۸۰</p>
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<p>۰</p>
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<p>۷۱/۵</p>
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<p>۲۸/۱۴</p>
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<p>۱۰۰٫۰</p>
<p>۸۰</p>
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<p>۰</p>
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<p>۷۱/۵</p>
<p> </p>
<p>۲۸/۱۴</p>
<p> </p>
<p>۱۰۰٫۰</p>
<p>۸۰</p>
<p> </p>
<p>۰</p>
<p> </p>
<p>۷۱/۸۵</p>
<p> </p>
<p>۱۰۰٫۰</p>
<p> </p>
<p>۱۰۰</p>
<p>نمودار ۳-۱۳ : میانگین توزیع فراوانی شگرد سرقت منزل توسط پاسخ دهندگان به سوالات پرسشنامه</p>
<p> </p>
<p>فراوانی توزیع انواع شگرد سرقت منزل در استان قم بدین صورت است که:۲۸ نفر معادل ۸۰درصد مرتکبین به وسیله تالیور زنی و ۲ نفر از افراد معادل ۷۱/۵ درصد مرتکبین از طریق کارت زنی و ۵ نفر معادل ۲۸/۱۴ درصد مرتکبین با عبور از روی دیوار اقدام به سرقت از منازل نموده اند این آمار نشان دهنده این است که تالیور زنی عمده شگرد سارقین منزل استان قم می‌باشد که اکثرا از طایفه فیوج می‌باشند که شگرد مخصوص آن ها می‌باشد.</p>
<p> </p>
<p>گفتار چهارم : بررسی عوامل بیرونی تاثیرگذار بر ایجاد انگیزه مجرمانه در سارقین</p>
<p> </p>
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<p>تاثیر دوستان ناباب فراوانی درصد درصد معتبر درصد تجمعی خیلی کم</p>
<p> </p>
<p>کم</p>
<p> </p>
<p>متوسط</p>
<p> </p>
<p>زیاد</p>
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<p>خیلی زیاد</p>
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<p>مجموع</p>
<p>۷</p>
<p> </p>
<p>۱۴</p>
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<p>۱۵</p>
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<p>۲۳</p>
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<p>۶۱</p>
<p>۸۳/۵</p>
<p> </p>
<p>۶۶/۱۱</p>
<p> </p>
<p>۵۰/۱۲</p>
<p> </p>
<p>۱۶/۱۹</p>
<p> </p>
<p>۸۳/۵۰</p>
<p> </p>
<p>۱۰۰٫۰</p>
<p>۸۳/۵</p>
<p> </p>
<p>۶۶/۱۱</p>
<p> </p>
<p>۵۰/۱۲</p>
<p> </p>
<p>۱۶/۱۹</p>
<p> </p>
<p>۸۳/۵۰</p>
<p> </p>
<p>۱۰۰٫۰</p>
<p>۸۳/۵</p>
<p> </p>
<p>۴۹/۱۷</p>
<p> </p>
<p>۹۹/۲۹</p>
<p> </p>
<p>۱۵/۴۹</p>
<p> </p>
<p>۱۰۰</p>
<p>جدول ۳-۱۴ : میانگین تاثیر دوستان ناباب در ارتکاب سرقت توسط پاسخ دهندگان به سوالات پرسشنامه</p>
<p> </p>
<p>نمودار ۳-۱۴ : میانگین تاثیر دوستان ناباب در ارتکاب سرقت توسط پاسخ دهندگان به سوالات پرسشنامه</p>
<p> </p>
<p>فراوانی تاثیر گذاری عامل تاثیر گذاری دوستان ناباب بر ارتکاب جرم سرقت در بین پرسش شوندگان بدین صورت است که:۷ نفر معادل ۸۳/۵درصد خیلی کم و ۱۴ نفر از افراد معادل ۶۶/۱۱ درصد کم و ۱۵ نفر معادل ۵۰/۱۲ درصد متوسط و ۲۳ نفر از افراد معادل ۱۶/۱۹ درصد زیاد و ۶۱ نفر از افراد معادل ۸۳/۵۰ درصد بسیار زیاد تحت تاثیر دوستان ناباب قرار گرفته اند ، آمار نشانده این است که ۷۰ درصد مرتکبین اذعان داشته اند که دوستان ناباب تحت تاثیر مستقیم دوستان ناباب بوده و آنان در ارتکاب بزه تاثیر بسزایی داشته اند.</p>
<p> </p>
<p>جدول ۳-۱۵ : میانگین توزیع و فراوانی میزان التزام به واجبات شرعی توسط پاسخ دهندگان به سوالات پرسشنامه</p>
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<p> </p>
<p>التزام به واجبات شرعی فراوانی درصد درصد معتبر درصد تجمعی خیلی کم</p>
<p> </p>
<p>کم</p>
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<p>متوسط</p>
<p> </p>
<p>زیاد</p>
<p> </p>
<p>خیلی زیاد</p>
<p> </p>
<p>مجموع</p>
<p>۷۳</p>
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<p>۲۸</p>
<p> </p>
<p>۱۷</p>
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<p>۲</p>
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<p>۰</p>
<p>۸۳/۶۰</p>
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<p>۳۳/۲۳</p>
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<p>۱۶/۱۴</p>
<p> </p>
<p>۶۶/۱</p>
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<p>۰</p>
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<p>۱۰۰٫۰</p>
<p>۸۳/۶۰</p>
<p> </p>
<p>۳۳/۲۳</p>
<p> </p>
<p>۱۶/۱۴</p>
<p> </p>
<p>۶۶/۱</p>
<p> </p>
<p>۰</p>
<p> </p>
<p>۱۰۰٫۰</p>
<p>۸۳/۵</p>
<p> </p>
<p>۱۶/۸۴</p>
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<p>۳۲/۹۸</p>
<p> </p>
<p>۹۸/۹۹</p>
<p> </p>
<p>۱۰۰</p>
<p>نمودار ۳-۱۵ : میانگین توزیع و فراوانی میزان التزام به واجبات شرعی توسط پاسخ دهندگان به سوالات پرسشنامه</p>
<p> </p>
<p>فراوانی تاثیر گذاری عامل تاثیر گذاری التزام به واجبات شرعی در بین پرسش شوندگان بدین صورت است که:۷۳ نفر معادل ۸۳/۶۰ درصدخیلی کم و ۲۸ نفر از افراد معادل ۳۳/۲۳ درصد کم و ۱۷ نفر معادل ۱۶/۱۴ درصد متوسط و ۲ نفر از افراد معادل ۶۶/۱ درصد زیاد و هیچ کدام از سارقین التزام خیلی زیاد به انجام واجبات شرعی نداشته اند ، آمار نشانده این است که اعتقاد و التزام به انجام واجبات شرعی تاثیر مستقیم بر جلوگیری از ارتکاب بزه در بین سارقین داشته است.</p>
<p> </p>
<p>جدول ۳-۱۶ : میانگین توزیع فراوانی نقش قانون و مجازات معینه در جهت پیشگیری از جرم از دیدگاه پاسخ دهندگان به سوالات پرسشنامه</p>
<p> </p>
<p> </p>
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<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p>نقش قانون در پیشگیری فراوانی درصد درصد معتبر درصد تجمعی خیلی کم</p>
<p> </p>
<p>کم</p>
<p> </p>
<p>متوسط</p>
<p> </p>
<p>زیاد</p>
<p> </p>
<p>خیلی زیاد</p>
<p> </p>
<p>مجموع</p>
<p>۵۹</p>
<p> </p>
<p>۳۳</p>
<p> </p>
<p>۱۷</p>
<p> </p>
<p>۹</p>
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<p>۲</p>
<p>۱۶/۴۹</p>
<p> </p>
<p>۵/۲۷</p>
<p> </p>
<p>۱۶/۱۴</p>
<p> </p>
<p>۵/۲</p>
<p> </p>
<p>۷۵/۰</p>
<p>۱۶/۴۹</p>
<p> </p>
<p>۵/۲۷</p>
<p> </p>
<p>۱۶/۱۴</p>
<p> </p>
<p>۵/۲</p>
<p> </p>
<p>۷۵/۰</p>
<p>۱۶/۴۹</p>
<p> </p>
<p>۶۶/۷۶</p>
<p> </p>
<p>۸۲/۹۰</p>
<p> </p>
<p>۱۶/۹۹</p>
<p> </p>
<p>۱۰۰</p>
<p> </p>
<p>۱۰۰٫۰</p>
<p>نمودار ۳-۱۶ : میانگین توزیع فراوانی نقش قانون و مجازات معینه در جهت پیشگیری از جرم از دیدگاه پاسخ دهندگان به سوالات پرسشنامه</p>
<p> </p>
<p>فراوانی تاثیر گذاری عامل نقش قانون و مجازات معینه در پیشگیری از وقوع جرم از دید پرسش شوندگان بدین صورت است که:۵۹ نفر معادل ۱۶/۴۹درصد خیلی کم و ۳۳ نفر از افراد معادل ۵/۲۷ درصد کم و ۱۷ نفر معادل ۱۶/۱۴ درصد متوسط و ۹ نفر از افراد معادل ۵/۲ درصد زیاد و ۲ نفر معادل ۷۵/۰ در صد افراد دارای نقش قانون را در پیشگیری از وقوع جرم خیلی زیاد می‌دانستند ، آمار نشانده این است که تنها تعداد قلیلی از سارقین قانون و مجازات را در پیشگیری از جرم دارای نقش برجسته ای دانسته اند شاید این امر به نحوه اجرای قانون نیز برگردد.</p>
</div>
</div>
<p>&#8220;</p><div class="item_footer"><p><small><a href="https://mel.kowsarblog.ir/فایل-های-مقالات-و-پروژه-ها-n-قسمت-17-nn8">مطلب اصلی</a> در <a href="http://kowsarblog.ir/">کوثربلاگ </a>ارسال شده است.</small></p></div>]]></content:encoded>
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		</item>
				<item>
			<title>&#34; تحقیق-پروژه و پایان نامه | ۲-۱-۵-۲- انواع صبر – 5 &#34;</title>
			<link>https://mel.kowsarblog.ir/تحقیق-پروژه-و-پایان-نامه-۲-۱-۵-۲-انواع-صبر-nn5</link>
			<pubDate>20:23:00 +0330 دوشنبه، 21 آذر 1401</pubDate>			<dc:creator>نویسنده محمدی</dc:creator>
			<category domain="main">بدون موضوع</category>			<guid isPermaLink="false">1546071@https://kowsarblog.ir/</guid>
						<description>&lt;p&gt;&amp;#8220;&lt;/p&gt;
&lt;div id=&quot;story&quot; class=&quot;story&quot; data-id=&quot;1557175516&quot; data-words=&quot;1128&quot;&gt;
&lt;div&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;صبر، واژه­ای است عربی که در لغت به معنای شکیبایی و خودداری است. این کلمه، بیان­کننده­ حالتی است از پایداری و خودداری از هر گونه عمل نسنجیده­ای در مقابل سختی­ها، فشارها، مشکلات، مصیبت­ها و نوعی پایداری درونی است برای کنترل واکنش­های تند عصبی(تمری،۱۳۸۹).&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;img src=&quot;https://ziso.ir/wp-content/uploads/2022/11/pics_23_50.png&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://feko.ir/&quot;&gt; &lt;img src=&quot;https://ziso.ir/wp-content/uploads/2021/10/THESIS-PAPER-12.png&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;همچنین صبر به امساک در تنگنا معنا شده است(صفورایی پاریزی،۱۳۸۹).&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;در اصطلاح علمای اخلاق، صبر عبارت است از ثبات و آرامش نفس در سختی­ها، بلایا، مصایب و پایداری و مقاومت در برابر آن ها، به گونه ­ای که از گشادگی خاطر و شادی و آرامشی که پیش از آن حوادث داشت بیرون نرود وزبان خود را از شکایت و اعضای خود را از حرکات ناهنجار نگاه دارد (صفورایی پاریزی،۱۳۸۹).&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;راغب (۱۳۶۲، به نقل از خوشحال دستجردی،۱۳۸۳) صبر را به وادار نمودن خود به آنچه عقل و دین اقتضا می­ کند و بازداشتن خود از آنچه عقل و دین نهی می­ کند، معنا ‌کرده‌است.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ملااحمد نراقی(۱۳۷۶) در معراج سعادۀ چنین می­گوید: «مطلق صبر، عبارت است از مقاومت کردن نفس با هوا و هوس خود و ثبات قوه عاقله، که باعث دین است در مقابل قوه شهویه که باعث هوا و هوس است، زیرا پیوسته میان این دو جنگ و نزاع، قائم و حرب و جدال، واقع است.»&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;صبر، یک حالت و ملکه­ی نفسانی و درونی است که باعث می­ شود انسان در مواجهه با مشکلات و گرفتاری­ها و اموری که مورد علاقه و پسندش نیست، جزع و بیتابی نکند و همچنین شکایت پیش مخلوقات خداوند ننماید (ایمانی،۱۳۸۸).&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;لازم به یادآوری است که منظور از صبر در دیدگاه اسلام، تحمل عجزآمیز نیست (حسین­ثابت، ۱۳۸۷). در حقیقت برخلاف آنچه عوام می­پندارند صبر به معنای به انتظار قضا و قدر الهی نشستن، بی­حرکتی و تلاش نکردن نیست؛ بلکه بیشتر به معنای مقاومت و ایستادگی در برابر هر آن چیزی است که بر انسان از بلایا و مصایب ناگوار آید. افراد صبور کسانی نیستند که در برابر ظلم ظالم، فزون­طلبی و تلخی و ناگواری مصیبت­ها تسلیم شوند، بلکه کسانی هستند که توان تحمل سختی­ها و مشکلات را دارند، بر خود مسلط هستند و از تعادل خارج نمی­شوند. اینان هنگام بروز یک مشکل، به خوبی می­اندیشند و به­موقع و به­اندازه اقدام ‌می‌کنند. پس نه صبر به معنای سکون و سکوت است و نه هر سکون و سکوتی نشانه بردباری است (همان منبع ).&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;در سایر منابع اسلامی نیز به مفهوم صبر اشاره شده است. امام محمد غزالی(۱۳۵۱) در کتاب احیاء علوم دین می­گوید: «صبر عبارت است از پایداری و ثبات لشگری در برابر لشگری دیگر که به علت تضاد بین خواسته ­ها و تمایلاتشان با یکدیگر به درگیری و جنگ پرداخته­اند. به عبارت دیگر صبر پایداری انگیزه دین در برابر انگیزه شهوت است، چنانچه انگیزه دینی در انسان ثابت و راسخ شود و بر انگیزه شهوت غلبه نماید وبطور مستمر با خواسته­ های شهوانی مبارزه کند؛ چنین انسانی در زمره صابرین خداوند را یاری می­دهد».&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;حضرت علی (ع) در توضیح چگونگی صبر، چهار وجه و علت برای آن برمی­شمرد: «صبر چهار شعبه دارد: شوق، ترس، زهد و انتظار. هرکس شوق بهشت داشته باشد، از هوا و هوس دست می­کشد و هرکس از آتش بترسد، از حرام­ها خود را نگه می­دارد و هرکس به دنیا بی­اعتنا باشد، گرفتاری­ها را به چیزی نگیرد و هرکه منتظر مرگ باشد، در کارهای خیر بکوشد» (شریف رضی،۱۳۸۷).&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;صبر دارای دو جنبه­ سلبی و ایجابی است. جنبه­ سلبی یا بازدارنده­ی صبر، شامل مفهوم کنترل و مهار است که از به هدر رفتن انرژی­های روانی فرد جلوگیری می­ کند. جنبه­ ایجابی هدایت­گرانه صبر، شامل مفهوم جهت دادن و تقویت جنبه­ های همگراست که منجر به اهتمام در امر واحدی می­ شود (حسین ثابت،۱۳۸۷).&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;غباری بناب(۱۳۷۹) نیز با توجه به گستردگی و کاربرد صبر در روان آدمی این تعریف را پیشنهاد می­ کند: « صبر یکی از روش­های خودتنظیمی است که موجب اعتدال روان آدمی می­گردد. منظور از خودتنظیمی قدرت استفاده از راهبردهایی است که در مقابل محرک­های درونی (ازقبیل افکار و حالاتی مثل غضب و خشم) و یا محرک‌های محیطی(مانند رویارویی با حوادث ناگوار، ناکامی­ها یا خوشی­های افراطی) انسان را از عدول از تعادل بازمی­دارد.»&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;نکته­ی مهم ‌در مورد صبر اینکه ‌می‌توان صبر را امری آموختنی دانست. در قرآن کریم و روایات معصومین برای صبر، نتایج و آثاری همچون سلامت جسمانی، پیروزی در دنیا، تبدیل مصائب به لطف خدا، استجابت دعا و وارد شدن به بهشت بیان شده است (ایزدی طامه،۱۳۸۷). همین آثار می ­توانند به عنوان تقویت­کننده عمل کنند و باعث ایجاد صبر و تحمل در انسان و افزایش احتمال بروز آن در رفتارهای وی گردند. اگر انسان در پیشامدهای ناگوار صبر کند و از رفتارهای نامطلوب مانند بیتابی بپرهیزد و مقاومت نشان دهد، رفته­رفته او به سختی عادت می­ کند و تحمل او در برابر سختی­ها افزایش می­یابد (غباری بناب،۱۳۷۹). این امر به وضوح مفهوم صبر را از قالب یک صفت انتسابی شخصیتی خارج می­ کند و امکان آموزش آن را به عنوان یک مهارت زندگی اجتماعی از طریق اصول حاکم بر نظریه یادگیری مطرح می­ کند.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;۲-۱-۵-۲- انواع صبر&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;برای صبر، انواعی ذکر شده است که در اینجا مهم­ترین آن ها را ذکر می­نماییم. پیامبر گرامی اسلام در روایتی درباره صبر می­فرمایند: صبر بر سه قسم است: صبر در مصیبت، صبر بر طاعت و صبر از گناه ( کلینی،۱۳۶۳).&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;صبر بر مصیبت:&lt;/strong&gt; یعنی پایداری در برابر حوادث تلخ و ناگوار و عدم برخورد انفعالی و ترک بیتابی. این نوع صبر، حفظ خود و استقامت و غلبه بر مشکلات بیرونی است که از طریق مقاومت در برابر مشکلات و استمرار در مقابله با آن به دست می ­آید. درغیر اینصورت، انسان در برخورد با دشواری­ها دچار تشویش، ناامیدی، بی ­تفاوتی و کاهش عزت نفس می­ شود؛ زیرا اگر انسان به سمت تقدیرگرایی پیش برود و خود را در حل مشکلات، مؤثر نداند، دست از تلاش برمی­دارد. انسان در صورتی می ­تواند در برابر سختی­ها مقاومت کند که نگاه خود به سختی­ها را تغییر دهد و سختی را معادل بدی نداند، بلکه شکست را مقدمه­ی پیروزی خود در نظر بگیرد. سختی­ها اگر با صبر توأم باشد، نردبان ترقی است و موجب پختگی انسان می­ شود. سختی­ها و دشواری‌ها و مصائب زندگی، جزء اجتناب­ناپذیر زندگی و از سنتهای پروردگار ‌می‌باشد؛ چراکه خداوند متعال می­فرماید:« و قطعاً همه شما را با چیزی از ترس و گرسنگی، زیان مالی و جانی و آفات زراعت آزمایش می­کنیم و صابران را بشارت و مژده بده » (بقره، ۱۵۵).&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;منظور از بلاء، بلاهای عمومی است که دلها را به وحشت می­ اندازد، شکم­ها را گرسنه می­سازد، دارایی­ ها را بر باد می­دهد و جانها را به خطر مرگ می­افکند، محصولات را آفت می­زند. با این وجود خداوند می­فرماید: «بشی­ء من . . .» یعنی «اندکی از»، گویا اشاره ‌به این است که اگر بلا بیشتر و بزرگتر باشد، تاب و توان تحمل آن را نخواهید داشت. پس این از نهایت لطف و رحمت خداوند است که به شما تخفیف داده و بیش از این شما را به زحمت و مشقت نمی­اندازد. خداوند می­خواهد با این تأکیدها، ضرورت صبر را بیان نماید( حسین ثابت،۱۳۸۷).&lt;/p&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&amp;#8220;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;item_footer&quot;&gt;&lt;p&gt;&lt;small&gt;&lt;a href=&quot;https://mel.kowsarblog.ir/تحقیق-پروژه-و-پایان-نامه-۲-۱-۵-۲-انواع-صبر-nn5&quot;&gt;مطلب اصلی&lt;/a&gt; در &lt;a href=&quot;http://kowsarblog.ir/&quot;&gt;کوثربلاگ &lt;/a&gt;ارسال شده است.&lt;/small&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;</description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;</p>
<div id="story" class="story" data-id="1557175516" data-words="1128">
<div>
<p> </p>
<p>صبر، واژه­ای است عربی که در لغت به معنای شکیبایی و خودداری است. این کلمه، بیان­کننده­ حالتی است از پایداری و خودداری از هر گونه عمل نسنجیده­ای در مقابل سختی­ها، فشارها، مشکلات، مصیبت­ها و نوعی پایداری درونی است برای کنترل واکنش­های تند عصبی(تمری،۱۳۸۹).</p>
<p><img src="https://ziso.ir/wp-content/uploads/2022/11/pics_23_50.png" /></p>
<p><a href="https://feko.ir/"> <img src="https://ziso.ir/wp-content/uploads/2021/10/THESIS-PAPER-12.png" /></a></p>
<p> </p>
<p>همچنین صبر به امساک در تنگنا معنا شده است(صفورایی پاریزی،۱۳۸۹).</p>
<p> </p>
<p>در اصطلاح علمای اخلاق، صبر عبارت است از ثبات و آرامش نفس در سختی­ها، بلایا، مصایب و پایداری و مقاومت در برابر آن ها، به گونه ­ای که از گشادگی خاطر و شادی و آرامشی که پیش از آن حوادث داشت بیرون نرود وزبان خود را از شکایت و اعضای خود را از حرکات ناهنجار نگاه دارد (صفورایی پاریزی،۱۳۸۹).</p>
<p> </p>
<p>راغب (۱۳۶۲، به نقل از خوشحال دستجردی،۱۳۸۳) صبر را به وادار نمودن خود به آنچه عقل و دین اقتضا می­ کند و بازداشتن خود از آنچه عقل و دین نهی می­ کند، معنا ‌کرده‌است.</p>
<p> </p>
<p>ملااحمد نراقی(۱۳۷۶) در معراج سعادۀ چنین می­گوید: «مطلق صبر، عبارت است از مقاومت کردن نفس با هوا و هوس خود و ثبات قوه عاقله، که باعث دین است در مقابل قوه شهویه که باعث هوا و هوس است، زیرا پیوسته میان این دو جنگ و نزاع، قائم و حرب و جدال، واقع است.»</p>
<p> </p>
<p>صبر، یک حالت و ملکه­ی نفسانی و درونی است که باعث می­ شود انسان در مواجهه با مشکلات و گرفتاری­ها و اموری که مورد علاقه و پسندش نیست، جزع و بیتابی نکند و همچنین شکایت پیش مخلوقات خداوند ننماید (ایمانی،۱۳۸۸).</p>
<p> </p>
<p>لازم به یادآوری است که منظور از صبر در دیدگاه اسلام، تحمل عجزآمیز نیست (حسین­ثابت، ۱۳۸۷). در حقیقت برخلاف آنچه عوام می­پندارند صبر به معنای به انتظار قضا و قدر الهی نشستن، بی­حرکتی و تلاش نکردن نیست؛ بلکه بیشتر به معنای مقاومت و ایستادگی در برابر هر آن چیزی است که بر انسان از بلایا و مصایب ناگوار آید. افراد صبور کسانی نیستند که در برابر ظلم ظالم، فزون­طلبی و تلخی و ناگواری مصیبت­ها تسلیم شوند، بلکه کسانی هستند که توان تحمل سختی­ها و مشکلات را دارند، بر خود مسلط هستند و از تعادل خارج نمی­شوند. اینان هنگام بروز یک مشکل، به خوبی می­اندیشند و به­موقع و به­اندازه اقدام ‌می‌کنند. پس نه صبر به معنای سکون و سکوت است و نه هر سکون و سکوتی نشانه بردباری است (همان منبع ).</p>
<p> </p>
<p>در سایر منابع اسلامی نیز به مفهوم صبر اشاره شده است. امام محمد غزالی(۱۳۵۱) در کتاب احیاء علوم دین می­گوید: «صبر عبارت است از پایداری و ثبات لشگری در برابر لشگری دیگر که به علت تضاد بین خواسته ­ها و تمایلاتشان با یکدیگر به درگیری و جنگ پرداخته­اند. به عبارت دیگر صبر پایداری انگیزه دین در برابر انگیزه شهوت است، چنانچه انگیزه دینی در انسان ثابت و راسخ شود و بر انگیزه شهوت غلبه نماید وبطور مستمر با خواسته­ های شهوانی مبارزه کند؛ چنین انسانی در زمره صابرین خداوند را یاری می­دهد».</p>
<p> </p>
<p>حضرت علی (ع) در توضیح چگونگی صبر، چهار وجه و علت برای آن برمی­شمرد: «صبر چهار شعبه دارد: شوق، ترس، زهد و انتظار. هرکس شوق بهشت داشته باشد، از هوا و هوس دست می­کشد و هرکس از آتش بترسد، از حرام­ها خود را نگه می­دارد و هرکس به دنیا بی­اعتنا باشد، گرفتاری­ها را به چیزی نگیرد و هرکه منتظر مرگ باشد، در کارهای خیر بکوشد» (شریف رضی،۱۳۸۷).</p>
<p> </p>
<p>صبر دارای دو جنبه­ سلبی و ایجابی است. جنبه­ سلبی یا بازدارنده­ی صبر، شامل مفهوم کنترل و مهار است که از به هدر رفتن انرژی­های روانی فرد جلوگیری می­ کند. جنبه­ ایجابی هدایت­گرانه صبر، شامل مفهوم جهت دادن و تقویت جنبه­ های همگراست که منجر به اهتمام در امر واحدی می­ شود (حسین ثابت،۱۳۸۷).</p>
<p> </p>
<p>غباری بناب(۱۳۷۹) نیز با توجه به گستردگی و کاربرد صبر در روان آدمی این تعریف را پیشنهاد می­ کند: « صبر یکی از روش­های خودتنظیمی است که موجب اعتدال روان آدمی می­گردد. منظور از خودتنظیمی قدرت استفاده از راهبردهایی است که در مقابل محرک­های درونی (ازقبیل افکار و حالاتی مثل غضب و خشم) و یا محرک‌های محیطی(مانند رویارویی با حوادث ناگوار، ناکامی­ها یا خوشی­های افراطی) انسان را از عدول از تعادل بازمی­دارد.»</p>
<p> </p>
<p>نکته­ی مهم ‌در مورد صبر اینکه ‌می‌توان صبر را امری آموختنی دانست. در قرآن کریم و روایات معصومین برای صبر، نتایج و آثاری همچون سلامت جسمانی، پیروزی در دنیا، تبدیل مصائب به لطف خدا، استجابت دعا و وارد شدن به بهشت بیان شده است (ایزدی طامه،۱۳۸۷). همین آثار می ­توانند به عنوان تقویت­کننده عمل کنند و باعث ایجاد صبر و تحمل در انسان و افزایش احتمال بروز آن در رفتارهای وی گردند. اگر انسان در پیشامدهای ناگوار صبر کند و از رفتارهای نامطلوب مانند بیتابی بپرهیزد و مقاومت نشان دهد، رفته­رفته او به سختی عادت می­ کند و تحمل او در برابر سختی­ها افزایش می­یابد (غباری بناب،۱۳۷۹). این امر به وضوح مفهوم صبر را از قالب یک صفت انتسابی شخصیتی خارج می­ کند و امکان آموزش آن را به عنوان یک مهارت زندگی اجتماعی از طریق اصول حاکم بر نظریه یادگیری مطرح می­ کند.</p>
<p> </p>
<p><strong>۲-۱-۵-۲- انواع صبر</strong></p>
<p> </p>
<p>برای صبر، انواعی ذکر شده است که در اینجا مهم­ترین آن ها را ذکر می­نماییم. پیامبر گرامی اسلام در روایتی درباره صبر می­فرمایند: صبر بر سه قسم است: صبر در مصیبت، صبر بر طاعت و صبر از گناه ( کلینی،۱۳۶۳).</p>
<p> </p>
<p><strong>صبر بر مصیبت:</strong> یعنی پایداری در برابر حوادث تلخ و ناگوار و عدم برخورد انفعالی و ترک بیتابی. این نوع صبر، حفظ خود و استقامت و غلبه بر مشکلات بیرونی است که از طریق مقاومت در برابر مشکلات و استمرار در مقابله با آن به دست می ­آید. درغیر اینصورت، انسان در برخورد با دشواری­ها دچار تشویش، ناامیدی، بی ­تفاوتی و کاهش عزت نفس می­ شود؛ زیرا اگر انسان به سمت تقدیرگرایی پیش برود و خود را در حل مشکلات، مؤثر نداند، دست از تلاش برمی­دارد. انسان در صورتی می ­تواند در برابر سختی­ها مقاومت کند که نگاه خود به سختی­ها را تغییر دهد و سختی را معادل بدی نداند، بلکه شکست را مقدمه­ی پیروزی خود در نظر بگیرد. سختی­ها اگر با صبر توأم باشد، نردبان ترقی است و موجب پختگی انسان می­ شود. سختی­ها و دشواری‌ها و مصائب زندگی، جزء اجتناب­ناپذیر زندگی و از سنتهای پروردگار ‌می‌باشد؛ چراکه خداوند متعال می­فرماید:« و قطعاً همه شما را با چیزی از ترس و گرسنگی، زیان مالی و جانی و آفات زراعت آزمایش می­کنیم و صابران را بشارت و مژده بده » (بقره، ۱۵۵).</p>
<p> </p>
<p>منظور از بلاء، بلاهای عمومی است که دلها را به وحشت می­ اندازد، شکم­ها را گرسنه می­سازد، دارایی­ ها را بر باد می­دهد و جانها را به خطر مرگ می­افکند، محصولات را آفت می­زند. با این وجود خداوند می­فرماید: «بشی­ء من . . .» یعنی «اندکی از»، گویا اشاره ‌به این است که اگر بلا بیشتر و بزرگتر باشد، تاب و توان تحمل آن را نخواهید داشت. پس این از نهایت لطف و رحمت خداوند است که به شما تخفیف داده و بیش از این شما را به زحمت و مشقت نمی­اندازد. خداوند می­خواهد با این تأکیدها، ضرورت صبر را بیان نماید( حسین ثابت،۱۳۸۷).</p>
</div>
</div>
<p>&#8220;</p><div class="item_footer"><p><small><a href="https://mel.kowsarblog.ir/تحقیق-پروژه-و-پایان-نامه-۲-۱-۵-۲-انواع-صبر-nn5">مطلب اصلی</a> در <a href="http://kowsarblog.ir/">کوثربلاگ </a>ارسال شده است.</small></p></div>]]></content:encoded>
								<comments>https://mel.kowsarblog.ir/تحقیق-پروژه-و-پایان-نامه-۲-۱-۵-۲-انواع-صبر-nn5#comments</comments>
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				<item>
			<title>&#34; مقاله-پروژه و پایان نامه | مبحث چهارم : مقایسه اصول و ارزشهای با اصول و ارزشهای عدالت کیفری – 3 &#34;</title>
			<link>https://mel.kowsarblog.ir/مقاله-پروژه-و-پایان-نامه-مبحث-چهارم-مقایسه-اصول-و-ارزشهای-با-اصول-و-ارزشهای</link>
			<pubDate>19:33:00 +0330 دوشنبه، 21 آذر 1401</pubDate>			<dc:creator>نویسنده محمدی</dc:creator>
			<category domain="main">بدون موضوع</category>			<guid isPermaLink="false">1545816@https://kowsarblog.ir/</guid>
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&lt;div&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;مبحث چهارم : مقایسه اصول و ارزش‌های با اصول و ارزش‌های عدالت کیفری&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;گفتار اول : اصول و ارزش‌های عدالت کیفری (سزادهنده)&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;الف) جرم به عنوان نقض قوانین دولتی تعریف می شود و دولت بزه دیده رسمی جرم است.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ب) جرم به عنوان نقض قاعده حقوقی و فنی محسوب می شود به طوری که مجرمیت و برائت همواره به طور دقیق از نظر حقوقی و نفی منعکس کننده تقصیر اخلاقی بزهکار است.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;img src=&quot;https://ziso.ir/wp-content/uploads/2022/11/pics_7_50.png&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;پ) حقوق و نیازهای بزه دیدگان و وابستگان آن ها جنبه فرعی داشته و نادیده گرفته می شود.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ت) نیازهای بزهکاران نادیده گرفته می شود و حقوق آن ها به طور تبعیض آمیز و خودسرانه اعمال می شود (معمولاً بستگی به تمکن مالی یا موقعیت بزهکار دارد)&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ث) دیدگاه ها جهت صدور آرا صرف نظر از حقیقت امر یا میزان صدمه وارده ، سزادهنده و سرکوبگر هستند.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ج) اصلاح و درمان و سازش به عنوان هدف در نظر گرفته نمی شوند.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;چ) عدالت به موجب قواعد مختلف، متشتت است.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ح) اجرای عدالت، بررسی تقصیر و مجرمیت شخص است.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;خ) عدالت به موجب قواعد و آئین دادرسی تعریف می شود.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;د) تمرکز عدالت بر روی مجازات، تلافی و تحمیل درد است.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ذ) عدالت مبتنی بر حقوقی است که به موجب قواعد کیفری و رویه قضائی مقرر شده اند.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ر) عدالت فاقد بخشش بوده و جایگاهی برای محبت و کمک ندارد.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://fekreshad.ir/&quot;&gt;&lt;img src=&quot;https://ziso.ir/wp-content/uploads/2021/10/THESIS-PAPER-5.png&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ز) فراموش کردن عواقب جرم بی اهمیت است.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ژ) عدالت در جهت ایجاد جامعه ای از هم گسیخته اعمال می شود و باز سازگاری روابط طرفین جرم را به همراه ندارد.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;س) عدالت ، مجازات مرگ و ضمانت اجراهای تلافی جویانه را ارتقا می بخشد.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ش) عدالت، کرامت انسانی و شأن نوع بشر را نادیده گرفته یا انکار می‌کند.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;گفتار دوم : اصول و ارزش‌های عدالت ترمیمی&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;الف) جرم از هم گسیختن یکپارچگی جامعه است و به عنوان صدمه ای تعریف می شود که به اشخاص و وابستگان آن ها وارد می شود.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ب) جرم به عنوان صدمه ای است که در تمامی جنبه ها اعم از اخلاقی – اجتماعی ، اقتصادی و سیاسی موجب ورود ضرر به طرفین جرم می شود ، به طوری که خسارات و نیازهای وارده به همه طرفین درگیر در جرم را در بر می‌گیرد.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;پ) محوریت با حقوق و نیازهای بزه دیدگان و وابستگان آن ها‌ است.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ت) محوریت با حقوق و نیازهای بزهکاران است صدمات وارده مهم هستند نیاز بزهکاران به مورد حمایت قرار گرفتن به منظور پیشگیری از محکومیت یافتن نادرست آن ها مورد توجه قرار می‌گیرد.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ث) دیدگاه های متنوع جهت صدور آرا و تصمیمات معقول و مؤثر مهم هستند.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ج) اعطای فرصت برای اصلاح و درمان و سازش امری حیاتی است.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;چ) عدالت ، سازگار کننده و یکپارچه کننده است.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ح) اجرای عدالت جستجو برای ارائه راه حل جهت حل و فصل اختلاف است.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;خ) عدالت به موجب نتیجه حل اختلاف و ثمره آن تعریف می شود.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;د) متمرکز عدالت بر روی احیاء حقوق طرفین جرم است.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ذ) عدالت مبتنی بر بخشش بزهکاران در جامعه است که همه اعضای آن جامعه در قبال جرم ارتکابی مسئول تلقی می‌شوند و همه مقصرند.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ر) عدالت بدون بخشش و محبت، انتقام تلقی می شود و نه عدالت&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ژ) فراموش کردن عواقب جرم امکان پذیر است.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;س) حرف عدالت گرد هم آمدن طرفین درگیر در جرم جهت احیاء و بازسازگاری روابط آن ها با سایرین است.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ش) عدالت، ترمیم و ‌پاسخ‌گویی‌ در قبال مردم را محور قرار می‌دهد و مبتنی بر نیازها و توانایی‌های طرفین جرم است.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ص) عدالت کرامت انسانی و شأن نوع بشر را به رسمیت شناخته و مورد احترام قرار می‌دهد.&lt;sup&gt;[۵۱]&lt;/sup&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;عدالت ترمیمی در برخی کشورها&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;پس از گذشت بیش از دو دهه از ظهور عدالت ترمیمی تحت تأثیر آموزه ها ، اصول و ارزش‌های آن نه تنها رویکرد مجریان عدالت کیفری دچار تغییرات و تحولات بنیادین شده است ، بکله قانون گذاران نیز از آن مستثنا نبوده و تلاش کرده‌اند برخی برنامه ها یا روش های اجرای عدالت ترمیمی را بر برنامه های عدالت کیفری سنتی مقدم دارند یا در کنار آن مورد توجه قرار دهند . در این راستا ، در بسیاری از کشورها از جمله کانادا ، استرالیا ، نیوزلند ، امریکا ، ایرلند ، سوئد ، روسیه ، ایتالیا ، اسپانیا ، اسلونی ، اتریش ، جمهوری چک ، بلژیک ، فرانسه ، دانمارک ، فنلاند ، انگلستان ، لهستان ، نروژ ، ژاپن و هند قانون گذاران و مجریان تلاش‌های زیادی برای اجرای آموزه های ترمیمی در امور کیفری به عمل آورده اند که در نتیجه به سیاست گذاری منطقه ای ( برای مثال شورای اروپا که قبلاً به آن اشاره شد ) و بین‌المللی (اقدامات سازمان ملل متحد و از جمله آخرین آن تصویب طرح اصول اساسی استفاده از برنامه های عدالت ترمیمی در موضوعات کیفری در شورای اقتصادی و اجتماعی آن سازمان در سال ۲۰۰۲) منجر شده است . بررسی کامل جایگاه عدالت ترمیمی در کشورهای مذکور در اینجا امکان پذیر نیست و به همین دلیل با توجه به سابقه و توسعه آن در کشورهایی همانند کانادا ، استرالیا ، نیوزیلند ، امریکا و آلمان به نحو مختصر به مطالعه وضعیت آن در این کشورها خواهیم پرداخت .&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;مبحث اول : عدالت ترمیمی در کانادا&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;بدون تردید سنتهای بومیان کانادا نقشی اساسی در ظهور و توسعه عدالت ترمیمی در کانادا و سایر کشورها دارد . اگر چه نمی توان انواع روش های اجرای عدالت در بومیان کانادا را به دلیل تنوع فرهنگی و اجتماعی بومیان در قالب مدل یا الگوی مشخص محدود کرد ، اما باید ‌به این نکته اشاره نمود که سنتهای مرسوم در میان آن ها دقیقاً مبتنی بر مفهوم عدالت ترمیمی است . بر این اساس ، آنگاه که این سنتهای غنی به خوبی شناخته شدند تأثیر مناسبی بر توسعه و گسترش عدالت ترمیمی در جهان و تعمیق آن در کانادا داشته اند .&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;روش سنتی بومیان کانادا برای اجرای عدالت در امور کیفری همان روش « حقله ها یا محافل» بود که با بهره گرفتن از آیینهای ویژه به اجرا در می‌آمد . در این روش گاه تأکید عمده بر جبران ضرر و زیان بزه دیده و گاه بر التیام بخشیدن و بهبودی وی بوده است .&lt;sup&gt;[۵۲]&lt;/sup&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;گفتار اول : تحولات ترمیمی شدن عدالت در کانادا&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;آغاز اجرای روش های جدید عدالت ترمیمی در کانادا به سال ۱۹۷۴ باز می‌گردد که کمیته مرکزی منونیت ( کلیسا ) استفاده از روش میانجی گری میان بزه دیده – بزه کار را در « کیتچنر – واترلو» (اونتاریو ) به دادگاه ها معرفثی نمود . از آن زمان نهادهای غیر دولتی و مذهبی پیشگام استفاده از روش های عدالت ترمیمی شده اند&lt;sup&gt;[۵۳]&lt;/sup&gt; . برای مثال « شورای کلیسا ‌در مورد عدالت و اصلاح و تربیت » که ائتلافی مذهبی مرکب از سرمایه گذاری یازده کلیسا در سطح ملی است از زمان تأسیس یعنی از سال ۱۹۷۴ ، عدالت ترمیمی را به عنوان محور و مبنای اقدامات خود در این کشور پذیرفته است .&lt;/p&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&amp;#8220;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;item_footer&quot;&gt;&lt;p&gt;&lt;small&gt;&lt;a href=&quot;https://mel.kowsarblog.ir/مقاله-پروژه-و-پایان-نامه-مبحث-چهارم-مقایسه-اصول-و-ارزشهای-با-اصول-و-ارزشهای&quot;&gt;مطلب اصلی&lt;/a&gt; در &lt;a href=&quot;http://kowsarblog.ir/&quot;&gt;کوثربلاگ &lt;/a&gt;ارسال شده است.&lt;/small&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;</description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;</p>
<div id="story" class="story" data-id="1557174291" data-words="1124">
<div>
<p> </p>
<p><strong>مبحث چهارم : مقایسه اصول و ارزش‌های با اصول و ارزش‌های عدالت کیفری</strong></p>
<p> </p>
<p><strong>گفتار اول : اصول و ارزش‌های عدالت کیفری (سزادهنده)</strong></p>
<p> </p>
<p>الف) جرم به عنوان نقض قوانین دولتی تعریف می شود و دولت بزه دیده رسمی جرم است.</p>
<p> </p>
<p>ب) جرم به عنوان نقض قاعده حقوقی و فنی محسوب می شود به طوری که مجرمیت و برائت همواره به طور دقیق از نظر حقوقی و نفی منعکس کننده تقصیر اخلاقی بزهکار است.</p>
<p><img src="https://ziso.ir/wp-content/uploads/2022/11/pics_7_50.png" /></p>
<p> </p>
<p>پ) حقوق و نیازهای بزه دیدگان و وابستگان آن ها جنبه فرعی داشته و نادیده گرفته می شود.</p>
<p> </p>
<p>ت) نیازهای بزهکاران نادیده گرفته می شود و حقوق آن ها به طور تبعیض آمیز و خودسرانه اعمال می شود (معمولاً بستگی به تمکن مالی یا موقعیت بزهکار دارد)</p>
<p> </p>
<p>ث) دیدگاه ها جهت صدور آرا صرف نظر از حقیقت امر یا میزان صدمه وارده ، سزادهنده و سرکوبگر هستند.</p>
<p> </p>
<p>ج) اصلاح و درمان و سازش به عنوان هدف در نظر گرفته نمی شوند.</p>
<p> </p>
<p>چ) عدالت به موجب قواعد مختلف، متشتت است.</p>
<p> </p>
<p>ح) اجرای عدالت، بررسی تقصیر و مجرمیت شخص است.</p>
<p> </p>
<p>خ) عدالت به موجب قواعد و آئین دادرسی تعریف می شود.</p>
<p> </p>
<p>د) تمرکز عدالت بر روی مجازات، تلافی و تحمیل درد است.</p>
<p> </p>
<p>ذ) عدالت مبتنی بر حقوقی است که به موجب قواعد کیفری و رویه قضائی مقرر شده اند.</p>
<p> </p>
<p>ر) عدالت فاقد بخشش بوده و جایگاهی برای محبت و کمک ندارد.</p>
<p><a href="https://fekreshad.ir/"><img src="https://ziso.ir/wp-content/uploads/2021/10/THESIS-PAPER-5.png" /></a></p>
<p> </p>
<p>ز) فراموش کردن عواقب جرم بی اهمیت است.</p>
<p> </p>
<p>ژ) عدالت در جهت ایجاد جامعه ای از هم گسیخته اعمال می شود و باز سازگاری روابط طرفین جرم را به همراه ندارد.</p>
<p> </p>
<p>س) عدالت ، مجازات مرگ و ضمانت اجراهای تلافی جویانه را ارتقا می بخشد.</p>
<p> </p>
<p>ش) عدالت، کرامت انسانی و شأن نوع بشر را نادیده گرفته یا انکار می‌کند.</p>
<p> </p>
<p><strong>گفتار دوم : اصول و ارزش‌های عدالت ترمیمی</strong></p>
<p> </p>
<p>الف) جرم از هم گسیختن یکپارچگی جامعه است و به عنوان صدمه ای تعریف می شود که به اشخاص و وابستگان آن ها وارد می شود.</p>
<p> </p>
<p>ب) جرم به عنوان صدمه ای است که در تمامی جنبه ها اعم از اخلاقی – اجتماعی ، اقتصادی و سیاسی موجب ورود ضرر به طرفین جرم می شود ، به طوری که خسارات و نیازهای وارده به همه طرفین درگیر در جرم را در بر می‌گیرد.</p>
<p> </p>
<p>پ) محوریت با حقوق و نیازهای بزه دیدگان و وابستگان آن ها‌ است.</p>
<p> </p>
<p>ت) محوریت با حقوق و نیازهای بزهکاران است صدمات وارده مهم هستند نیاز بزهکاران به مورد حمایت قرار گرفتن به منظور پیشگیری از محکومیت یافتن نادرست آن ها مورد توجه قرار می‌گیرد.</p>
<p> </p>
<p>ث) دیدگاه های متنوع جهت صدور آرا و تصمیمات معقول و مؤثر مهم هستند.</p>
<p> </p>
<p>ج) اعطای فرصت برای اصلاح و درمان و سازش امری حیاتی است.</p>
<p> </p>
<p>چ) عدالت ، سازگار کننده و یکپارچه کننده است.</p>
<p> </p>
<p>ح) اجرای عدالت جستجو برای ارائه راه حل جهت حل و فصل اختلاف است.</p>
<p> </p>
<p>خ) عدالت به موجب نتیجه حل اختلاف و ثمره آن تعریف می شود.</p>
<p> </p>
<p>د) متمرکز عدالت بر روی احیاء حقوق طرفین جرم است.</p>
<p> </p>
<p>ذ) عدالت مبتنی بر بخشش بزهکاران در جامعه است که همه اعضای آن جامعه در قبال جرم ارتکابی مسئول تلقی می‌شوند و همه مقصرند.</p>
<p> </p>
<p>ر) عدالت بدون بخشش و محبت، انتقام تلقی می شود و نه عدالت</p>
<p> </p>
<p>ژ) فراموش کردن عواقب جرم امکان پذیر است.</p>
<p> </p>
<p>س) حرف عدالت گرد هم آمدن طرفین درگیر در جرم جهت احیاء و بازسازگاری روابط آن ها با سایرین است.</p>
<p> </p>
<p>ش) عدالت، ترمیم و ‌پاسخ‌گویی‌ در قبال مردم را محور قرار می‌دهد و مبتنی بر نیازها و توانایی‌های طرفین جرم است.</p>
<p> </p>
<p>ص) عدالت کرامت انسانی و شأن نوع بشر را به رسمیت شناخته و مورد احترام قرار می‌دهد.<sup>[۵۱]</sup></p>
<p> </p>
<p><strong>عدالت ترمیمی در برخی کشورها</strong></p>
<p> </p>
<p>پس از گذشت بیش از دو دهه از ظهور عدالت ترمیمی تحت تأثیر آموزه ها ، اصول و ارزش‌های آن نه تنها رویکرد مجریان عدالت کیفری دچار تغییرات و تحولات بنیادین شده است ، بکله قانون گذاران نیز از آن مستثنا نبوده و تلاش کرده‌اند برخی برنامه ها یا روش های اجرای عدالت ترمیمی را بر برنامه های عدالت کیفری سنتی مقدم دارند یا در کنار آن مورد توجه قرار دهند . در این راستا ، در بسیاری از کشورها از جمله کانادا ، استرالیا ، نیوزلند ، امریکا ، ایرلند ، سوئد ، روسیه ، ایتالیا ، اسپانیا ، اسلونی ، اتریش ، جمهوری چک ، بلژیک ، فرانسه ، دانمارک ، فنلاند ، انگلستان ، لهستان ، نروژ ، ژاپن و هند قانون گذاران و مجریان تلاش‌های زیادی برای اجرای آموزه های ترمیمی در امور کیفری به عمل آورده اند که در نتیجه به سیاست گذاری منطقه ای ( برای مثال شورای اروپا که قبلاً به آن اشاره شد ) و بین‌المللی (اقدامات سازمان ملل متحد و از جمله آخرین آن تصویب طرح اصول اساسی استفاده از برنامه های عدالت ترمیمی در موضوعات کیفری در شورای اقتصادی و اجتماعی آن سازمان در سال ۲۰۰۲) منجر شده است . بررسی کامل جایگاه عدالت ترمیمی در کشورهای مذکور در اینجا امکان پذیر نیست و به همین دلیل با توجه به سابقه و توسعه آن در کشورهایی همانند کانادا ، استرالیا ، نیوزیلند ، امریکا و آلمان به نحو مختصر به مطالعه وضعیت آن در این کشورها خواهیم پرداخت .</p>
<p> </p>
<p><strong>مبحث اول : عدالت ترمیمی در کانادا</strong></p>
<p> </p>
<p>بدون تردید سنتهای بومیان کانادا نقشی اساسی در ظهور و توسعه عدالت ترمیمی در کانادا و سایر کشورها دارد . اگر چه نمی توان انواع روش های اجرای عدالت در بومیان کانادا را به دلیل تنوع فرهنگی و اجتماعی بومیان در قالب مدل یا الگوی مشخص محدود کرد ، اما باید ‌به این نکته اشاره نمود که سنتهای مرسوم در میان آن ها دقیقاً مبتنی بر مفهوم عدالت ترمیمی است . بر این اساس ، آنگاه که این سنتهای غنی به خوبی شناخته شدند تأثیر مناسبی بر توسعه و گسترش عدالت ترمیمی در جهان و تعمیق آن در کانادا داشته اند .</p>
<p> </p>
<p>روش سنتی بومیان کانادا برای اجرای عدالت در امور کیفری همان روش « حقله ها یا محافل» بود که با بهره گرفتن از آیینهای ویژه به اجرا در می‌آمد . در این روش گاه تأکید عمده بر جبران ضرر و زیان بزه دیده و گاه بر التیام بخشیدن و بهبودی وی بوده است .<sup>[۵۲]</sup></p>
<p> </p>
<p><strong>گفتار اول : تحولات ترمیمی شدن عدالت در کانادا</strong></p>
<p> </p>
<p>آغاز اجرای روش های جدید عدالت ترمیمی در کانادا به سال ۱۹۷۴ باز می‌گردد که کمیته مرکزی منونیت ( کلیسا ) استفاده از روش میانجی گری میان بزه دیده – بزه کار را در « کیتچنر – واترلو» (اونتاریو ) به دادگاه ها معرفثی نمود . از آن زمان نهادهای غیر دولتی و مذهبی پیشگام استفاده از روش های عدالت ترمیمی شده اند<sup>[۵۳]</sup> . برای مثال « شورای کلیسا ‌در مورد عدالت و اصلاح و تربیت » که ائتلافی مذهبی مرکب از سرمایه گذاری یازده کلیسا در سطح ملی است از زمان تأسیس یعنی از سال ۱۹۷۴ ، عدالت ترمیمی را به عنوان محور و مبنای اقدامات خود در این کشور پذیرفته است .</p>
</div>
</div>
<p>&#8220;</p><div class="item_footer"><p><small><a href="https://mel.kowsarblog.ir/مقاله-پروژه-و-پایان-نامه-مبحث-چهارم-مقایسه-اصول-و-ارزشهای-با-اصول-و-ارزشهای">مطلب اصلی</a> در <a href="http://kowsarblog.ir/">کوثربلاگ </a>ارسال شده است.</small></p></div>]]></content:encoded>
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			<title>&#34; فایل های دانشگاهی| نقش کارکنان در حصول رضایت مشتری – 8 &#34;</title>
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			<pubDate>18:43:00 +0330 دوشنبه، 21 آذر 1401</pubDate>			<dc:creator>نویسنده محمدی</dc:creator>
			<category domain="main">بدون موضوع</category>			<guid isPermaLink="false">1545561@https://kowsarblog.ir/</guid>
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&lt;div&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;اصول هشت گانه مدیریت کیفیت شامل موارد زیر می‌باشد.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱-مشتری محوری&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۲- رهبری&lt;br /&gt;۳-مشارکت کارکنان&lt;br /&gt;۴- ‌فرآیندگرایی&lt;br /&gt;۵- رویکرد سیستمی در مدیریت&lt;br /&gt;۶- بهبود مداوم&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;img src=&quot;https://ziso.ir/wp-content/uploads/2022/11/pics-23.png&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۷-رویکرد واقع بینانه در تصمیم گیری&lt;br /&gt;۸- رابطه سود بخش متقابل با تأمین کننده ها&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;-مشتری گرایی&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;«مشتری» همان کسی است که نیازش را خود تعریف می‌کند، کالاها و خدمات تولیدی ما را مصرف می‌کند و حاضر است بابت آن هزینه مناسبی را بپردازد. تا سال ۱۹۹۰، استباط جهان تجارت از استعمال واژه مشتری صرفاً بر انجام معادلات تجاری محض محدود بود که درآمدی از آن حاصل می شد ولی امروزه مشتری به عنوان یک واحد غیردرآمدزا نیز مطرح است. امروزه، رضایت مشتری مهمترین اولویت مدیریتی در مقابل اهداف دیگر سازمان چون سودآوری، سهم بیشتر بازار و … می‌باشد و به عبارتی ارزشمندترین دارایی هر سازمان اعتماد و اطمینان مشتریان اوست. ‌بنابرین‏ مشتری محور اصلی فلسفه وجودی سازمان ها است.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://nefo.ir/&quot;&gt; &lt;img src=&quot;https://ziso.ir/wp-content/uploads/2021/10/THESIS-PAPER-12.png&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;پرفسور ناریاکی کانو، نظریه پرداز مشهور کیفیت در سطح جهانی کیفیت را اینگونه تعریف می‌کند: برآوردن نیازها، خواسته ها و انتظارات مشتری و حتی فراتر از رضایت او رفتن و بدین ترتیب رضایت مشتری فراهم شده، تولید استمرار یافته و نتیجتاً سود دراز مدت تأمین می‌گردد.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;h1&gt;نقش کارکنان در حصول رضایت مشتری&lt;/h1&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;موقعیت هر تشکیلاتی حاصل انتخاب مناسب افرادی است که برای انجام کارهای مهم و کلیدی آن برگزیده می‌شوند. لذا اهمیت کارکنان از خود مشتریان مهم تر می‌باشد. زیرا این کارمند خوب است که می‌تواند مشتریان خود را برای سازمان جذب کند و رضایتمندی آن ها را حاصل نماید. لذا می توان گفت که کارکنان مشتری مدار باعث جلب رضایت مشتری و باعث سودآوری سازمان می‌شوند. مجدداً این سودآوری باعث افزایش انگیزه شده و این چرخه تکرار می شود.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;جهت جلب رضایت ارباب رجوع / مشتری در بخش خدمات دولتی لازم است کارکنان سازمان به ابعادی مثل اطلاع رسانی، سرعت در ارائه خدمات، صحت خدمات، رفتار مناسب، قانونمندی، سادگی و سهولت، انعطاف پذیری، فروتنی، کامل بودن، وضوح، صحیح بودن، با توجه نمودن پاکیزگی و . . . توجه نمایند.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;h1&gt;-رهبری&lt;/h1&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;رهبری یعنی تعیین اهداف و ایجاد انگیزه در افراد برای تلاش در جهت دستیابی به اهداف سازمان.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;بایستی مدیران در حرف و عمل الهام بخش کارکنان برای تلاش در جهت بهبود و سرآمدی سازمان باشند. چشم انداز دقیقی از اهداف اینده سازمان برای کارکنان رسم کنند، در رسیدن به اهداف سازمانی باثبات باشند و محیطی را فراهم نمایند که در آن کارکنان نیز بتوانند به خوبی کار کنند.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;در این راستا معیارهای رهبری سرآمد در سازمان به شرح ذیل ارائه می‌گردد.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;الف – رهبران، مأموریت، چشم انداز، ارزش‌ها و اخلاقیات سازمان را تدوین و خودشان به عنوان الگوی فرهنگ سرآمدی، عمل می‌کنند.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ب- رهبران از ایجاد، توسعه و به کارگیری سیستم‌های مدیریت و بهبود مستمر آن ها شخصاً اطمینان حاصل می نمایند.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ج – رهبران با مشتریان و شرکا و نمایندگان جامعه در تعامل هستند.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;د – رهبران فرهنگ سرآمدی را در بین کارکنان تقویت می‌کنند.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;و – رهبران تحول سازمانی را درک کرده و از آن حمایت می‌کنند.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;h1&gt;– مشارکت کارکنان&lt;/h1&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;مشارکت، یک ساز و کار اجتماعی به شمار می‌آید و نقشی کلیدی در همه قلمروهای زندگی اعمال می‌کند و موجبات شکوفایی و بالندگی فراگیر را فراهم می آورد.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;منظور از مدیریت مشارکتی، فراهم آوردن فضا و نظامی توسط مدیریت است که تمام کارکنان یک سازمان در روند تصمیم گیری و حل مسائل و مشکلات سازمان با مدیریت همکاری و مشارکت نمایند. تأکید اصلی این نوع مدیریت بر همکاری و مشارکت داوطلبانه کارکنان و مدیران است و می خواهند از ایده ها، پیشنهادات، ابتکارات، خلاقیت ها و توان فنی و تخصصی آن ها در حل مسائل و مشکلات سازمان جهت بهبود مستمر فعالیت های سازمان استفاده کنند.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;فلسفه و مبانی نظری مدیریت مشارکتی نیاز انسان به احترام و برابری و اظهار وجود، حمایت و پشتیبانی انسان از نظرات و دستاوردهای خود، کمال جویی مستمر انسان، توسعه نیروی انسانی در فرایند مشارکت، مشورت در عقول دیگران، هدایت به بهترین تصمیم با داشتن نظرات بیشتر، امر به معروف و نهی از منکر و بهبود روابط انسانی بین مدیریت و کارکنان می‌باشد. برای کامیابی مشارکت در سازمان ها ضروری است که مقدماتی فراهم آید تا معنی و مفهوم مشارکت به خوبی تحلیل شود و افراد به درستی و سودبخشی آن باور آورند. همچنین در یک سازمان می توان شماری از برنامه های مختلف مشارکت جو را به اجرا گذاشت.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;این برنامه ها عبارتند از:&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ul&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ul&gt;
&lt;li&gt;رایزنی و مشورت با دیگران&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ul&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ul&gt;
&lt;li&gt;پذیرش و بررسی پیشنهادها&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ul&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ul&gt;
&lt;li&gt;حلقه های کیفی&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ul&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ul&gt;
&lt;li&gt;‌گروه‌های کاری مستقل&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ul&gt;
&lt;li&gt;و تصمیم گیری دو جانبه&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;
&lt;p&gt;با اجرای نظام مشارکت، نیروی انسانی سازمان ها توسعه می‌یابد که پایه و اساس هر گونه توسعه سازمانی محسوب می‌گردد. دست ‌آورده‌هایی از قبیل افزایش کیفیت خدمات، کاهش ضایعات، بهبود مستمر انجام فعالیت ها، افزایش رضایت ارباب رجوع و در نهایت افزایش بهره وری در سازمان، محصول نیروی انسانی توسعه یافته است.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;h1&gt;-رویکرد فرایندی&lt;/h1&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;استاندارد ISO 9000 در توضیح فرآیندگرایی اعلام می‌کند که هر فعالیت با مجموعه ای از فعالیت ها که با صرف منابعی ورودی ها را به خروجی ها تبدیل کند، یک فرایند به شمار می رود.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;از دیدگاه سیستمی می توان گفت که یک فرایند، بخش اساسی هر سیستم را تشکیل می‌دهد که وظیفه و مأموریت اساسی آن سیستم، تبدیل ورودی را به خروجی، به انجام می رساند.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;استاندارد ISO 9001، یکی از مزایای فرآِیند گرایی را کنترل پویایی می‌داند که بر ارتباط بین فرآیندهای مجزا در نظام و نیز ترکیب و تعامل آن ها اعمال می‌گردد. کاربرد این گرایش در نظام مدیریت کیفیت، تأکیدی بر درک و برآورده ساختن نیازمندی ها، توجه به فرآیندها برحسب ارزش افزوده آن ها، کسب نتایج اجرا و اثربخشی فرایند و بهبود مداوم فرآیندها ‌بر اساس اندازه گیری عینی است.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;بهبود عملکرد در سازمان و همچنین بهبود فرآیندها، اصلی ترین هدف هر نظام مدیریتی، از جمله نظام های مدیریت کیفیت مبتنی بر استاندارد ISO 9001 به شمار می رود. با توجه به مطالب فوق و ضرورت ارتقای اثربخشی و کارایی در سطح سازمان ها، باید بر شناخت فرآیندهای سازمان و بهبود آن تأکید گردد. این امر تا به آنجا اهمیت دارد که امروزه مهندسی مجدد و اصلاح ساختار سازمان ها ‌بر اساس فرآیندها به یکی از گرایش های غالب در طراحی ساختار و بهبود سازمانی تبدیل شده است.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;دلیل این توجه ناشی از آن است که به راستی اثربخشی هر سازمان، محدود به میزان اثربخشی فرآیندهای آن است.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;h1&gt;-نگرش سیستمی&lt;/h1&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;فرایند و سیستم با هم پیوند ناگستنی دارند. فرایند بخش اساسی هر سیستم را تشکیل می‌دهد. از مجموع عناصر ورودی، فرایند و خروجی، یک سیستم یا نظام شکل می‌گیرد.&lt;/p&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&amp;#8220;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;item_footer&quot;&gt;&lt;p&gt;&lt;small&gt;&lt;a href=&quot;https://mel.kowsarblog.ir/فایل-های-دانشگاهی-نقش-کارکنان-در-حصول-رضایت-مشتری-nn8&quot;&gt;مطلب اصلی&lt;/a&gt; در &lt;a href=&quot;http://kowsarblog.ir/&quot;&gt;کوثربلاگ &lt;/a&gt;ارسال شده است.&lt;/small&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;</description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;</p>
<div id="story" class="story" data-id="1557099238" data-words="1056">
<div>
<p> </p>
<p>اصول هشت گانه مدیریت کیفیت شامل موارد زیر می‌باشد.</p>
<p> </p>
<p>۱-مشتری محوری</p>
<p> </p>
<p>۲- رهبری<br />۳-مشارکت کارکنان<br />۴- ‌فرآیندگرایی<br />۵- رویکرد سیستمی در مدیریت<br />۶- بهبود مداوم</p>
<p><img src="https://ziso.ir/wp-content/uploads/2022/11/pics-23.png" /></p>
<p>۷-رویکرد واقع بینانه در تصمیم گیری<br />۸- رابطه سود بخش متقابل با تأمین کننده ها</p>
<p> </p>
<p><strong>-مشتری گرایی</strong></p>
<p> </p>
<p>«مشتری» همان کسی است که نیازش را خود تعریف می‌کند، کالاها و خدمات تولیدی ما را مصرف می‌کند و حاضر است بابت آن هزینه مناسبی را بپردازد. تا سال ۱۹۹۰، استباط جهان تجارت از استعمال واژه مشتری صرفاً بر انجام معادلات تجاری محض محدود بود که درآمدی از آن حاصل می شد ولی امروزه مشتری به عنوان یک واحد غیردرآمدزا نیز مطرح است. امروزه، رضایت مشتری مهمترین اولویت مدیریتی در مقابل اهداف دیگر سازمان چون سودآوری، سهم بیشتر بازار و … می‌باشد و به عبارتی ارزشمندترین دارایی هر سازمان اعتماد و اطمینان مشتریان اوست. ‌بنابرین‏ مشتری محور اصلی فلسفه وجودی سازمان ها است.</p>
<p><a href="https://nefo.ir/"> <img src="https://ziso.ir/wp-content/uploads/2021/10/THESIS-PAPER-12.png" /></a></p>
<p> </p>
<p>پرفسور ناریاکی کانو، نظریه پرداز مشهور کیفیت در سطح جهانی کیفیت را اینگونه تعریف می‌کند: برآوردن نیازها، خواسته ها و انتظارات مشتری و حتی فراتر از رضایت او رفتن و بدین ترتیب رضایت مشتری فراهم شده، تولید استمرار یافته و نتیجتاً سود دراز مدت تأمین می‌گردد.</p>
<p> </p>
<h1>نقش کارکنان در حصول رضایت مشتری</h1>
<p> </p>
<p>موقعیت هر تشکیلاتی حاصل انتخاب مناسب افرادی است که برای انجام کارهای مهم و کلیدی آن برگزیده می‌شوند. لذا اهمیت کارکنان از خود مشتریان مهم تر می‌باشد. زیرا این کارمند خوب است که می‌تواند مشتریان خود را برای سازمان جذب کند و رضایتمندی آن ها را حاصل نماید. لذا می توان گفت که کارکنان مشتری مدار باعث جلب رضایت مشتری و باعث سودآوری سازمان می‌شوند. مجدداً این سودآوری باعث افزایش انگیزه شده و این چرخه تکرار می شود.</p>
<p> </p>
<p>جهت جلب رضایت ارباب رجوع / مشتری در بخش خدمات دولتی لازم است کارکنان سازمان به ابعادی مثل اطلاع رسانی، سرعت در ارائه خدمات، صحت خدمات، رفتار مناسب، قانونمندی، سادگی و سهولت، انعطاف پذیری، فروتنی، کامل بودن، وضوح، صحیح بودن، با توجه نمودن پاکیزگی و . . . توجه نمایند.</p>
<p> </p>
<h1>-رهبری</h1>
<p> </p>
<p>رهبری یعنی تعیین اهداف و ایجاد انگیزه در افراد برای تلاش در جهت دستیابی به اهداف سازمان.</p>
<p> </p>
<p>بایستی مدیران در حرف و عمل الهام بخش کارکنان برای تلاش در جهت بهبود و سرآمدی سازمان باشند. چشم انداز دقیقی از اهداف اینده سازمان برای کارکنان رسم کنند، در رسیدن به اهداف سازمانی باثبات باشند و محیطی را فراهم نمایند که در آن کارکنان نیز بتوانند به خوبی کار کنند.</p>
<p> </p>
<p>در این راستا معیارهای رهبری سرآمد در سازمان به شرح ذیل ارائه می‌گردد.</p>
<p> </p>
<p>الف – رهبران، مأموریت، چشم انداز، ارزش‌ها و اخلاقیات سازمان را تدوین و خودشان به عنوان الگوی فرهنگ سرآمدی، عمل می‌کنند.</p>
<p> </p>
<p>ب- رهبران از ایجاد، توسعه و به کارگیری سیستم‌های مدیریت و بهبود مستمر آن ها شخصاً اطمینان حاصل می نمایند.</p>
<p> </p>
<p>ج – رهبران با مشتریان و شرکا و نمایندگان جامعه در تعامل هستند.</p>
<p> </p>
<p>د – رهبران فرهنگ سرآمدی را در بین کارکنان تقویت می‌کنند.</p>
<p> </p>
<p>و – رهبران تحول سازمانی را درک کرده و از آن حمایت می‌کنند.</p>
<p> </p>
<h1>– مشارکت کارکنان</h1>
<p> </p>
<p>مشارکت، یک ساز و کار اجتماعی به شمار می‌آید و نقشی کلیدی در همه قلمروهای زندگی اعمال می‌کند و موجبات شکوفایی و بالندگی فراگیر را فراهم می آورد.</p>
<p> </p>
<p>منظور از مدیریت مشارکتی، فراهم آوردن فضا و نظامی توسط مدیریت است که تمام کارکنان یک سازمان در روند تصمیم گیری و حل مسائل و مشکلات سازمان با مدیریت همکاری و مشارکت نمایند. تأکید اصلی این نوع مدیریت بر همکاری و مشارکت داوطلبانه کارکنان و مدیران است و می خواهند از ایده ها، پیشنهادات، ابتکارات، خلاقیت ها و توان فنی و تخصصی آن ها در حل مسائل و مشکلات سازمان جهت بهبود مستمر فعالیت های سازمان استفاده کنند.</p>
<p> </p>
<p>فلسفه و مبانی نظری مدیریت مشارکتی نیاز انسان به احترام و برابری و اظهار وجود، حمایت و پشتیبانی انسان از نظرات و دستاوردهای خود، کمال جویی مستمر انسان، توسعه نیروی انسانی در فرایند مشارکت، مشورت در عقول دیگران، هدایت به بهترین تصمیم با داشتن نظرات بیشتر، امر به معروف و نهی از منکر و بهبود روابط انسانی بین مدیریت و کارکنان می‌باشد. برای کامیابی مشارکت در سازمان ها ضروری است که مقدماتی فراهم آید تا معنی و مفهوم مشارکت به خوبی تحلیل شود و افراد به درستی و سودبخشی آن باور آورند. همچنین در یک سازمان می توان شماری از برنامه های مختلف مشارکت جو را به اجرا گذاشت.</p>
<p> </p>
<p>این برنامه ها عبارتند از:</p>
<p> </p>
<ul>
<li>
<ul>
<li>رایزنی و مشورت با دیگران</li>
</ul>
</li>
</ul>
<p> </p>
<ul>
<li>
<ul>
<li>پذیرش و بررسی پیشنهادها</li>
</ul>
</li>
</ul>
<p> </p>
<ul>
<li>
<ul>
<li>حلقه های کیفی</li>
</ul>
</li>
</ul>
<p> </p>
<ul>
<li>
<ul>
<li>‌گروه‌های کاری مستقل</li>
</ul>
</li>
</ul>
<p> </p>
<ul>
<li>و تصمیم گیری دو جانبه</li>
</ul>
<p>با اجرای نظام مشارکت، نیروی انسانی سازمان ها توسعه می‌یابد که پایه و اساس هر گونه توسعه سازمانی محسوب می‌گردد. دست ‌آورده‌هایی از قبیل افزایش کیفیت خدمات، کاهش ضایعات، بهبود مستمر انجام فعالیت ها، افزایش رضایت ارباب رجوع و در نهایت افزایش بهره وری در سازمان، محصول نیروی انسانی توسعه یافته است.</p>
<p> </p>
<h1>-رویکرد فرایندی</h1>
<p> </p>
<p>استاندارد ISO 9000 در توضیح فرآیندگرایی اعلام می‌کند که هر فعالیت با مجموعه ای از فعالیت ها که با صرف منابعی ورودی ها را به خروجی ها تبدیل کند، یک فرایند به شمار می رود.</p>
<p> </p>
<p>از دیدگاه سیستمی می توان گفت که یک فرایند، بخش اساسی هر سیستم را تشکیل می‌دهد که وظیفه و مأموریت اساسی آن سیستم، تبدیل ورودی را به خروجی، به انجام می رساند.</p>
<p> </p>
<p>استاندارد ISO 9001، یکی از مزایای فرآِیند گرایی را کنترل پویایی می‌داند که بر ارتباط بین فرآیندهای مجزا در نظام و نیز ترکیب و تعامل آن ها اعمال می‌گردد. کاربرد این گرایش در نظام مدیریت کیفیت، تأکیدی بر درک و برآورده ساختن نیازمندی ها، توجه به فرآیندها برحسب ارزش افزوده آن ها، کسب نتایج اجرا و اثربخشی فرایند و بهبود مداوم فرآیندها ‌بر اساس اندازه گیری عینی است.</p>
<p> </p>
<p>بهبود عملکرد در سازمان و همچنین بهبود فرآیندها، اصلی ترین هدف هر نظام مدیریتی، از جمله نظام های مدیریت کیفیت مبتنی بر استاندارد ISO 9001 به شمار می رود. با توجه به مطالب فوق و ضرورت ارتقای اثربخشی و کارایی در سطح سازمان ها، باید بر شناخت فرآیندهای سازمان و بهبود آن تأکید گردد. این امر تا به آنجا اهمیت دارد که امروزه مهندسی مجدد و اصلاح ساختار سازمان ها ‌بر اساس فرآیندها به یکی از گرایش های غالب در طراحی ساختار و بهبود سازمانی تبدیل شده است.</p>
<p> </p>
<p>دلیل این توجه ناشی از آن است که به راستی اثربخشی هر سازمان، محدود به میزان اثربخشی فرآیندهای آن است.</p>
<p> </p>
<h1>-نگرش سیستمی</h1>
<p> </p>
<p>فرایند و سیستم با هم پیوند ناگستنی دارند. فرایند بخش اساسی هر سیستم را تشکیل می‌دهد. از مجموع عناصر ورودی، فرایند و خروجی، یک سیستم یا نظام شکل می‌گیرد.</p>
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</div>
<p>&#8220;</p><div class="item_footer"><p><small><a href="https://mel.kowsarblog.ir/فایل-های-دانشگاهی-نقش-کارکنان-در-حصول-رضایت-مشتری-nn8">مطلب اصلی</a> در <a href="http://kowsarblog.ir/">کوثربلاگ </a>ارسال شده است.</small></p></div>]]></content:encoded>
								<comments>https://mel.kowsarblog.ir/فایل-های-دانشگاهی-نقش-کارکنان-در-حصول-رضایت-مشتری-nn8#comments</comments>
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		</item>
				<item>
			<title>&#34; مقالات و پایان نامه ها | – 3 &#34;</title>
			<link>https://mel.kowsarblog.ir/مقالات-و-پایان-نامه-ها-nn3</link>
			<pubDate>17:53:00 +0330 دوشنبه، 21 آذر 1401</pubDate>			<dc:creator>نویسنده محمدی</dc:creator>
			<category domain="main">بدون موضوع</category>			<guid isPermaLink="false">1545304@https://kowsarblog.ir/</guid>
						<description>&lt;p&gt;&amp;#8220;&lt;/p&gt;
&lt;div id=&quot;story&quot; class=&quot;story&quot; data-id=&quot;1557173554&quot; data-words=&quot;1140&quot;&gt;
&lt;div&gt;
&lt;p&gt;بدون شک، شناخت قواعد فقهی یکی از ضرروتی ترین مسائلی است که طلاب و دانشجویان علوم دینی و حقوق دانان اسلامی و پویندگان راه اجتهاد به آن نیازمند هستند و بدون آگاهی کامل از آن ها، هیچ تلاشی در راه رسیدن به اجتهاد صحیح و فهم حقوق اسلامی به ثمر نمی نشیند. این قواعد فرمول هایی هستند که منشا استنباط قوانین مختلف و متعدد در ابواب مختلف فقه می‌گردند و اختصاص به مورد خاصی ندارند.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;img src=&quot;https://ziso.ir/wp-content/uploads/2022/11/pics_9_50.png&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;قواعد فقه با مسائل علم اصول این تفاوت را دارند که مسائل اصول کبراهایی هستند که در طریق رسیدن به حکم فرعی الهی مفید واقع می‌شوند؛ به عبارت دیگر، واسطه و وسیله برای کشف و استنباط احکام شرعی فرعی می‌گردند. ولی قواعد فقهی به یک اعتبار، خودشان در حکم احکام هستند و نه واسطه برای کشف. مسائل علم اصول متدولوژی کشف و استنباط احکام شرعی است؛ ولی قواعد فقه نهادها و بنیادهای کلی فقهی است که با توجه به کلیت و شمول آن ها فقیه در مصادیق مختلف از آن استفاده می‌کند.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://elmifar.ir/&quot;&gt; &lt;img src=&quot;https://ziso.ir/wp-content/uploads/2021/10/THESIS-PAPER-9.png&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱-۱ مستندات قاعده ی « لا ضرر »&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;قاعده ی « لا ضرر » از اساسی ترین و معروف ترین قواعد فقه اسلامی است و با توجه به مدارک و منابع چهار گانه ی فقه می توان به آن استناد کرد. در اغلب نظام های حقوقی معاصر این موضوع تحت عنوان «عدم جواز سوء استفاده از حق » مطرح شده است و می توان گفت که منشاء عقلی دارد و بنای عقلا بر این قاعده استوار است. از جمله، در حقوق مدنی فرانسه حدود هفتاد سال پیش،در حقوق کامن لو مربوط به انگلستان حدود نود سال پیش و نیز در حقوق آمریکا و کانادا و استرالیا،بحث آن مطرح شده است؛ولی با وجود همه این ها ، اسلام این مسئله را حدود هزار و چهارصد سال پیش، تحت عنوان «لاضرر ولاضرار فی الاسلام» مطرح ‌کرده‌است و می توان گفت که کامل ترین و مترقی ترین نظام حقوقی دنیا‌ است.در اینجا ابتدا مدارک و مستندات این قاعده را با توجه به آیات قرانی مطرح می‌کنیم.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱-۱- ۱ کتاب&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;اگر چه همان‌ طور که از اسم این قاعده پیدا‌ است، مدرک مهم این قاعده حدیث متواتر نبوی «لاضرر و لاضرار فی الاسلام» است، ولی در قران مجید نیز آیاتی وجود دارد که با تصریح به واژه ی ضرر » و مشتقات آن در موارد خاصی احکامی را ارائه ‌کرده‌است که از باب تعلیق حکم بر وصف – که خود مُشعِر بر علیت است – حاوی مفهوم عامی است و « لا ضرر » را می‌تواند به صورت یک قاعده تثبیت کند(تیمیه ، ۱۳۸۰، ص ۲۵ ) که مواردی از آن را ذکر می‌کنیم :&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱- « لا تضارّ والدَه بولدها و لا مولودٌ لهُ بولدهِ »۱ ؛ یعنی هیچ مادری نباید به فرزندش ضرر برساند و نیز هیچ پدری نباید به فرزندش زیان بزند.طبق این آیه ، از جمله مادران ، از اینکه با قطع شیر موجب ضرر و زیان فرزند خود شوند ، نهی شده اند.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۲- «ولا تمسکوهن ضرارا لتعتدوا»۲ ؛یعنی نگاه ندارید آن زنان را تا تعدی کنید.‌در مورد این آیه توضیحی لازم است ، ظاهراً گروهی از مردان ، زنان خود را طلاق می‌گفتند و بعد به آن ها رجوع می‌کردند ، البته نه به علت رغبتی که به آن ها داشتند ،بلکه با نیت تجاوز و تعدی و گاه پایمال کردن حقوق مالی ناشی از زوجیت که به زنان تعلق می گرفت.قران کریم در این آیه نیز مردان از اینکه با نیت تعدی و تجاوز و پایمال کردن حقوق همسر خود ، بعد از طلاق به آن ها رجوع کنند و آن ها را نگه دارند منع و نهی شده اند&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۳- «…من بعد وصیه یوصی بها او دین غیر مضار»۳ ؛یعنی پس از وصیتی که بدان وصیت می شود یا دینی ، «غیر ضرر رساننده»طبق این آیه ،ترکه بعد از آن که مورد وصیت یا دین از آن خارج گردید بین ورثه تقسیم می شود،مشروط بر این که موصی زیان رساننده نباشد؛یعنی وصیتی که در آن موصی به ورثه ظلم نکرده و ضرر نزده باشد نافذ و لازم الاجرا است،چون چه بسا موصی به قصد اضرار به ورثه به دینی اقرار کند یا وصیتی ضالمانه کند و بدین وسیله ورثه را از میراث محروم سازد.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱-البقره :۲/۲۳۳&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۲-البقره :۲/۲۳۱&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۳- النساء : ۴/۱۲&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۴- «و لا یضار کاتب و لا شهید»۴ ؛یعنی نویسنده و گواهی دهنده دین نباید ضرر برساند،بدین معنا که کاتب و نویسنده و تنظیم کننده ی دین و معامله ( سند نویس)نباید امری را که غیر واقع است بنویسد و هم چنین شاهد باید دقیقا به چیزی که اتفاق افتاده گواهی دهد و چیزی از آن نکاهد.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۵- «والذین اتخذوا مسجدا ضرارا و کفرا و تفریقا…»۵ ، به موجب این آیه که بعد از غزوه تبوک نازل شده است ، پبامبر اکرم ( ص ) از اقامه ی نماز در آن مسجدی که در نزدیکی مسجد قبا برای ضرر و کفر و تفرقه ساخته شده بود، نهی شدند و دستور دادند که آن مسجد تخریب یا سوزانده شود و به نقلی آن را تبدیل به زباله دانی کردند(طباطبائی،۱۴۰۳ ، ص۳۹۱)&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۱-۱-۲ سنت&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;روایت «لا ضرر» به صورت متواتر در کتاب های فقه و حدیث شیعه و اهل تسنن وجود دارد؛ منتها این تواتر لفظی نیست؛ چرا که همه ی روایات مذکور به یک لفظ نیست ولی دارای مضمون و معنای واحدی است و به عبارت دیگر « تواتر معنوی » دارد و لذا فخر المحققین در « ایضاح الفوائد » ادعای تواتر معنوی این روایت ‌کرده‌است. (حلی، ۱۳۸۷ ، ص۴۸ ) معروف ترین احادیث ‌در مورد این قاعده مربوط به جریان سمره بن جندب است که در ذیل آن عبارت لاضرر و لا ضرار با اندک تفاوتی نقل شده است؛ این داستان را تدوین کنندگان کتاب های اربعه ی شیعه که به محمدین ثلاثه معروف هستند (محمد بن یعقوب کلینی، مؤلف کتاب « الکافی »؛ محمدبن علی بن بابویه قمی، معروف به شیخ صدوق، مؤلف کتاب « من لا یحضره الفقیه » و محمدبن حسن طوسی معروف به شیخ طوسی، مؤلف دو کتاب «تهذیب الاحکام » و «الاستبصار ») با اختلافات جزئی در کتاب های خود آورده اند. به نوشته ی مرحوم مامقانی در کتاب «الرجال » و ابن ابی الحدید معتزلی در شرح نهج البلاغه ، سمره بن جندب مرد بسیار بدی بوده است ، از دشمنان سر سخت اهل بیت ( ع ) به شمار می رفته و با گرفتن درهم و دینار ، احادیث زیادی را به نفع حکّام جائر زمانش جعل ‌کرده‌است.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۴- البقره :۲/۲۸۴&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;۵- التّوبه :۹/۱۰۷&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ابن ابی الحدید می‌گوید: « سمره از زمان پیامبر اکرم ( ص ) تا زمان امام حسین ( ع ) زنده بود و در ماجرای کربلا جزء سپاه عبید الله بن زیاد بود و مردم را به جنگ با امام حسین ( ع )تحریک می کرد. » (ابن ابی الحدید مدائنی ، ۱۴۲۸ ، ج۱ ص۲۳۰ ؛ مامقانی ، ۱۳۵۲ ، ص ۶۹ )&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;به هر حال ، روایات در باب «لا ضرر» زیاد است که به تعدادی از آن ها اشاره می شود :&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&amp;#8220;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;item_footer&quot;&gt;&lt;p&gt;&lt;small&gt;&lt;a href=&quot;https://mel.kowsarblog.ir/مقالات-و-پایان-نامه-ها-nn3&quot;&gt;مطلب اصلی&lt;/a&gt; در &lt;a href=&quot;http://kowsarblog.ir/&quot;&gt;کوثربلاگ &lt;/a&gt;ارسال شده است.&lt;/small&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;</description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;</p>
<div id="story" class="story" data-id="1557173554" data-words="1140">
<div>
<p>بدون شک، شناخت قواعد فقهی یکی از ضرروتی ترین مسائلی است که طلاب و دانشجویان علوم دینی و حقوق دانان اسلامی و پویندگان راه اجتهاد به آن نیازمند هستند و بدون آگاهی کامل از آن ها، هیچ تلاشی در راه رسیدن به اجتهاد صحیح و فهم حقوق اسلامی به ثمر نمی نشیند. این قواعد فرمول هایی هستند که منشا استنباط قوانین مختلف و متعدد در ابواب مختلف فقه می‌گردند و اختصاص به مورد خاصی ندارند.</p>
<p><img src="https://ziso.ir/wp-content/uploads/2022/11/pics_9_50.png" /></p>
<p> </p>
<p>قواعد فقه با مسائل علم اصول این تفاوت را دارند که مسائل اصول کبراهایی هستند که در طریق رسیدن به حکم فرعی الهی مفید واقع می‌شوند؛ به عبارت دیگر، واسطه و وسیله برای کشف و استنباط احکام شرعی فرعی می‌گردند. ولی قواعد فقهی به یک اعتبار، خودشان در حکم احکام هستند و نه واسطه برای کشف. مسائل علم اصول متدولوژی کشف و استنباط احکام شرعی است؛ ولی قواعد فقه نهادها و بنیادهای کلی فقهی است که با توجه به کلیت و شمول آن ها فقیه در مصادیق مختلف از آن استفاده می‌کند.</p>
<p><a href="https://elmifar.ir/"> <img src="https://ziso.ir/wp-content/uploads/2021/10/THESIS-PAPER-9.png" /></a></p>
<p> </p>
<p>۱-۱ مستندات قاعده ی « لا ضرر »</p>
<p> </p>
<p>قاعده ی « لا ضرر » از اساسی ترین و معروف ترین قواعد فقه اسلامی است و با توجه به مدارک و منابع چهار گانه ی فقه می توان به آن استناد کرد. در اغلب نظام های حقوقی معاصر این موضوع تحت عنوان «عدم جواز سوء استفاده از حق » مطرح شده است و می توان گفت که منشاء عقلی دارد و بنای عقلا بر این قاعده استوار است. از جمله، در حقوق مدنی فرانسه حدود هفتاد سال پیش،در حقوق کامن لو مربوط به انگلستان حدود نود سال پیش و نیز در حقوق آمریکا و کانادا و استرالیا،بحث آن مطرح شده است؛ولی با وجود همه این ها ، اسلام این مسئله را حدود هزار و چهارصد سال پیش، تحت عنوان «لاضرر ولاضرار فی الاسلام» مطرح ‌کرده‌است و می توان گفت که کامل ترین و مترقی ترین نظام حقوقی دنیا‌ است.در اینجا ابتدا مدارک و مستندات این قاعده را با توجه به آیات قرانی مطرح می‌کنیم.</p>
<p> </p>
<p>۱-۱- ۱ کتاب</p>
<p> </p>
<p>اگر چه همان‌ طور که از اسم این قاعده پیدا‌ است، مدرک مهم این قاعده حدیث متواتر نبوی «لاضرر و لاضرار فی الاسلام» است، ولی در قران مجید نیز آیاتی وجود دارد که با تصریح به واژه ی ضرر » و مشتقات آن در موارد خاصی احکامی را ارائه ‌کرده‌است که از باب تعلیق حکم بر وصف – که خود مُشعِر بر علیت است – حاوی مفهوم عامی است و « لا ضرر » را می‌تواند به صورت یک قاعده تثبیت کند(تیمیه ، ۱۳۸۰، ص ۲۵ ) که مواردی از آن را ذکر می‌کنیم :</p>
<p> </p>
<p>۱- « لا تضارّ والدَه بولدها و لا مولودٌ لهُ بولدهِ »۱ ؛ یعنی هیچ مادری نباید به فرزندش ضرر برساند و نیز هیچ پدری نباید به فرزندش زیان بزند.طبق این آیه ، از جمله مادران ، از اینکه با قطع شیر موجب ضرر و زیان فرزند خود شوند ، نهی شده اند.</p>
<p> </p>
<p>۲- «ولا تمسکوهن ضرارا لتعتدوا»۲ ؛یعنی نگاه ندارید آن زنان را تا تعدی کنید.‌در مورد این آیه توضیحی لازم است ، ظاهراً گروهی از مردان ، زنان خود را طلاق می‌گفتند و بعد به آن ها رجوع می‌کردند ، البته نه به علت رغبتی که به آن ها داشتند ،بلکه با نیت تجاوز و تعدی و گاه پایمال کردن حقوق مالی ناشی از زوجیت که به زنان تعلق می گرفت.قران کریم در این آیه نیز مردان از اینکه با نیت تعدی و تجاوز و پایمال کردن حقوق همسر خود ، بعد از طلاق به آن ها رجوع کنند و آن ها را نگه دارند منع و نهی شده اند</p>
<p> </p>
<p>۳- «…من بعد وصیه یوصی بها او دین غیر مضار»۳ ؛یعنی پس از وصیتی که بدان وصیت می شود یا دینی ، «غیر ضرر رساننده»طبق این آیه ،ترکه بعد از آن که مورد وصیت یا دین از آن خارج گردید بین ورثه تقسیم می شود،مشروط بر این که موصی زیان رساننده نباشد؛یعنی وصیتی که در آن موصی به ورثه ظلم نکرده و ضرر نزده باشد نافذ و لازم الاجرا است،چون چه بسا موصی به قصد اضرار به ورثه به دینی اقرار کند یا وصیتی ضالمانه کند و بدین وسیله ورثه را از میراث محروم سازد.</p>
<p> </p>
<p>۱-البقره :۲/۲۳۳</p>
<p> </p>
<p>۲-البقره :۲/۲۳۱</p>
<p> </p>
<p>۳- النساء : ۴/۱۲</p>
<p> </p>
<p>۴- «و لا یضار کاتب و لا شهید»۴ ؛یعنی نویسنده و گواهی دهنده دین نباید ضرر برساند،بدین معنا که کاتب و نویسنده و تنظیم کننده ی دین و معامله ( سند نویس)نباید امری را که غیر واقع است بنویسد و هم چنین شاهد باید دقیقا به چیزی که اتفاق افتاده گواهی دهد و چیزی از آن نکاهد.</p>
<p> </p>
<p>۵- «والذین اتخذوا مسجدا ضرارا و کفرا و تفریقا…»۵ ، به موجب این آیه که بعد از غزوه تبوک نازل شده است ، پبامبر اکرم ( ص ) از اقامه ی نماز در آن مسجدی که در نزدیکی مسجد قبا برای ضرر و کفر و تفرقه ساخته شده بود، نهی شدند و دستور دادند که آن مسجد تخریب یا سوزانده شود و به نقلی آن را تبدیل به زباله دانی کردند(طباطبائی،۱۴۰۳ ، ص۳۹۱)</p>
<p> </p>
<p>۱-۱-۲ سنت</p>
<p> </p>
<p>روایت «لا ضرر» به صورت متواتر در کتاب های فقه و حدیث شیعه و اهل تسنن وجود دارد؛ منتها این تواتر لفظی نیست؛ چرا که همه ی روایات مذکور به یک لفظ نیست ولی دارای مضمون و معنای واحدی است و به عبارت دیگر « تواتر معنوی » دارد و لذا فخر المحققین در « ایضاح الفوائد » ادعای تواتر معنوی این روایت ‌کرده‌است. (حلی، ۱۳۸۷ ، ص۴۸ ) معروف ترین احادیث ‌در مورد این قاعده مربوط به جریان سمره بن جندب است که در ذیل آن عبارت لاضرر و لا ضرار با اندک تفاوتی نقل شده است؛ این داستان را تدوین کنندگان کتاب های اربعه ی شیعه که به محمدین ثلاثه معروف هستند (محمد بن یعقوب کلینی، مؤلف کتاب « الکافی »؛ محمدبن علی بن بابویه قمی، معروف به شیخ صدوق، مؤلف کتاب « من لا یحضره الفقیه » و محمدبن حسن طوسی معروف به شیخ طوسی، مؤلف دو کتاب «تهذیب الاحکام » و «الاستبصار ») با اختلافات جزئی در کتاب های خود آورده اند. به نوشته ی مرحوم مامقانی در کتاب «الرجال » و ابن ابی الحدید معتزلی در شرح نهج البلاغه ، سمره بن جندب مرد بسیار بدی بوده است ، از دشمنان سر سخت اهل بیت ( ع ) به شمار می رفته و با گرفتن درهم و دینار ، احادیث زیادی را به نفع حکّام جائر زمانش جعل ‌کرده‌است.</p>
<p> </p>
<p>۴- البقره :۲/۲۸۴</p>
<p> </p>
<p>۵- التّوبه :۹/۱۰۷</p>
<p> </p>
<p>ابن ابی الحدید می‌گوید: « سمره از زمان پیامبر اکرم ( ص ) تا زمان امام حسین ( ع ) زنده بود و در ماجرای کربلا جزء سپاه عبید الله بن زیاد بود و مردم را به جنگ با امام حسین ( ع )تحریک می کرد. » (ابن ابی الحدید مدائنی ، ۱۴۲۸ ، ج۱ ص۲۳۰ ؛ مامقانی ، ۱۳۵۲ ، ص ۶۹ )</p>
<p> </p>
<p>به هر حال ، روایات در باب «لا ضرر» زیاد است که به تعدادی از آن ها اشاره می شود :</p>
<p> </p>
</div>
</div>
<p>&#8220;</p><div class="item_footer"><p><small><a href="https://mel.kowsarblog.ir/مقالات-و-پایان-نامه-ها-nn3">مطلب اصلی</a> در <a href="http://kowsarblog.ir/">کوثربلاگ </a>ارسال شده است.</small></p></div>]]></content:encoded>
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				<item>
			<title>&#34; دانلود پایان نامه های آماده – قسمت 29 – 3 &#34;</title>
			<link>https://mel.kowsarblog.ir/دانلود-پایان-نامه-های-آماده-n-قسمت-29-nn3</link>
			<pubDate>17:03:00 +0330 دوشنبه، 21 آذر 1401</pubDate>			<dc:creator>نویسنده محمدی</dc:creator>
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&lt;div&gt;
&lt;ul&gt;
&lt;li&gt;. محمدجعفر جعفری لنگرودی، مقدمه عمومی علم حقوق، تهران، گنج دانش، ۱۳۷۱، ص ۱۵٫ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. محمد معین، فرهنگ فارسی معین، بی‌نا، ۱۳۸۲٫ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. عبدالکریم بی‌آزار شیرازی، رساله نوین، ج ۳، دفتر نشر فرهنگ اسلامی، ۱۳۶۴، ص ۱۸٫ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. حسن حیدرى، یوسف ابراهیمى نسب، جایگاه زن در گذر تاریخ و سیرى در حقوق آن، ‌فصل‌نامه علمى پژوهشى زن و فرهنگ/ سال دوم. شماره پنجم. پاییز ۱۳۸۹، صص ۷۵تا ۸۰ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt;&lt;img src=&quot;https://ziso.ir/wp-content/uploads/2022/11/pics_24_50.png&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. حسن صدر، حقوق زن در اسلام و اروپا، سازمان انتشارات جاویدان، ۱۳۲۷، ص ۳۱٫ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. همان منبع، ص ۴۹٫ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. یحیی نوری، جاهلیت و اسلام، بنیاد علمی و اسلامی مدرسه الشهدا، ۱۳۶۰، ص ۶۰۴٫ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. مرتضی مطهری، نظام حقوق زن در اسلام، پیشین، ص ۱۴۳تا۱۴۵٫ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. ناصر مکارم شیرازی و دیگران، تفسیر نمونه، دارالکتب‌الاسلامیه، ج ۲، ۱۳۵۳، ص ۱۱۰٫ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. سوره روم، آیه ۲۱٫ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. محمود طلوعى، فرهنگ جامع سیاسى، تهران، نشر سخن، ۱۳۷۲، ص ۷۰۳ و ۷۷۹؛ عبدالرسول بیات، فرهنگ واژه‏ ها، مؤسسه اندیشه و فرهنگ دینى، ۱۳۸۱، ص ۲۹۰٫ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. پاملا آبوت، والاس کلر، «تولید دانش فمینیستی». در جامعه‌شناسی زنان. ترجمهٔ منیژه نجم‌عراقی. چاپ چاپ چهارم. تهران: نشر نی، ۱۳۸۵. ۲۹۳ تا ۲۹۷. ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. مگی هام، فرهنگ نظریه های فمینیستی، ترجمه نوشین احمدی خراسانی، فیروزه مهاجر، فرخ قره‌داغی، تهران: انتشارات توسعه،. ۱۳۸۲، ص۴۱۹٫آلیسون وایلی، فمینیسم و علوم اجتماعی، ترجمه عباس یزدانی، مجموعه مقالات فمینیسم و دانش‌های فمینیستی، قم: دفتر مطالعات و تحقیقات زنان،. ۱۳۸۲، ص ۴۱۸٫عزازی، شهلا، فمینیسم و دیدگاه‌ها، تهران: انتشارات روشنگران، ۱۳۸۵، ص۱۷٫ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. قاسم شعبانی، حقوق اساسی و ساختار حکومت جمهوری اسلامی ایران، چ ۴۶، انتشارات اطلاعات، ۱۳۹۱، ص ۹۸ -۹۹٫ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. زهرا آیت‌اللهی، زنان – وضع حقوقی و قوانین – ایران، شورای فرهنگی اجتماعی زنان، روابط عمومی، ۱۳۹۲٫ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. ناصر کاتوزیان، حقوق مدنی خانواده، جلد اول، چاپ پنجم، حقوق مدنی، خانواده ۲، نشر میزان، ۱۳۷۸٫ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. اسماعیل ساولانی، حقوق جزای عمومی، منطبق با قانون مجازات اسلامی مصوب ۱۳۹۲، چاپ سوم، انتشارات دادآفرین، ۱۳۹۲٫ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. حسین مهرپور، حقوق بشر در اسناد بین‌المللی و موضع جمهوری اسلامی ایران، چاپ دوم، انتشارات اطلاعات، تهران، ۱۳۸۶، صص ۳۳۰-۳۳۶٫ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. کمال مصطفی پور، حقوق زنان، اسناد بین‌المللی، موضع ایران، منتشر شده در پایگاه نشر مقالات حقوقی، حق گستر، کارشناس ارشد حقوق بشر«دانشگاه شهید بهشتی»، ۱۳۹۰٫ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. Conde, H. Victor, A Handbook of International Human Rights Terminology, santa Barbara C A: ABC- Clio, 2002, second Edition, p. 127. ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. Ibid , p. 128 ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. محمد قاری سید فاطمی، حقوق بشر در جهان معاصر، مرکز چاپ و انتشارات دانشگاه شهید بهشتی، ۱۳۸۲، تهران، صص ۱۹۰-۱۹۱٫ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. Universal Declaration of Human Rights, UN, G. A. Res. No 217 A (III) on 10Dec. 1948 ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. محمد قاری سید فاطمی، پیشین، ص ۱۹۲٫ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. Covenant ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. Convention ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. Treaty ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. Declarations ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. International Covenant on Economic, Social and Cultural Rights, UN, G. A. Res. No 2200A (XXI) of 16 Dec. 1966. ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. International Covenant on Civil and political Rights, UN, G. A. , Res. No 2200A (XXI) of 16 Dec. 1966. ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. Convention on the prevention and punishment of the crime of Genocide , UN, G. A. , Res. 260A (III) of 9 Dec. 1948. ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. International Convention on the Elimination of all Forms of Racial Discrimination , UN, G. A. , Res. 2106 (XX) of 21 Dec. 1965. ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. Convention Against Torture and other Cruel , inhuman or Degrading treatment or punishment , UN, G. A. , Res. 39/46 of Dec. 1984. ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. Convention on the Elimination of all Forms of Discrimination Against women , UN, G. A. , Res. 34/180 of 18 Dec. 1979. ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. Convention on the Elimination the Rights of the child , UN, G. A. , Res. 44/25 of 20 Nov. 1989. ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. Declaration on of all Forms of Intolerance and of Discrimination Based on Religion or Belief, UN, G. A. , Res. 36/55 of 25 November. 1981. ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. Declaration on the Elimination of Violence Against women (1994). ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. Declaration on the Rights of persons Belonging to National or Ethnic, Religious and linguistic Minorities (1992). ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. جهت آشنایی بیشتر با این اسناد و دستیابی به متون کامل مربوطه می­توانید به منابع زیر مراجعه کنید: حسین مهرپور، نظام بین‌المللی حقوق بشر، انتشارات اطلاعات، تهران، ۱۳۸۳، چاپ دوم، صص ۳۶-۱۵۰٫ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. جمشید شریفیان، راهبرد جمهوری اسلامی ایران در زمینه حقوق بشر در سازمان ملل متحد، چاپ اول، مرکز چاپ و انتشارات وزارت امور خارجه، تهران، ۱۳۸۰، صص ۹۸-۱۴۹٫ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. (art. 1)3, see: cun ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. see: UDHR(1948) ART3-21 ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. SEE: UDHR(1948) ART 29 ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. UN DOC. ALRES. /44/128. ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. برگرفته از سایت صدا و سیما. ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. برگرفته از سایت صدا و سیما. ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. Atticle 15-1 states parties shall accord to women equality with men before the law. ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. میترا باقریان، بررسی ویژگی‌های اشتغال زنان در ایران، تهران، سازمان برنامه و بودجه، ۱۳۶۹، صص۲، ۱ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. عزت الله عراقی، حقوق بین‌المللی کار، تهران، انتشارات دانشگاه تهران، ۱۳۶۷ صص ۴۲۴و ۴۲۳٫ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. نسرین جزنی، بررسی موانع و مشکلات موجود در اشتغال زنان در بخش‌های دولتی، ت‍ه‍ران‌، ش‍رک‍ت‌ ان‍ت‍ش‍ارات‌ س‍وره‌ م‍ه‍ر، ۱۳۸۳، ص ۱۳٫ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. محمدرضا علویون، کار زنان در حقوق ایران و حقوق بین‌المللی کار، تهران، انتشارات روشنگران و مطالعات زنان، ۱۳۸۴، صص ۲۳و۲۲٫ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. کار، مهرانگیز، رفع تبعیض از زنان ؛ مقایسه کنوانسیون رفع تبعیض از زنان با قوانین داخلی ایران، تهران، نشر قطره، ۱۳۷۹، چاپ سوم، ص ۲۶۵ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;
&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;. Article 5-States Parties shall take all appropriate measures(a) To Modify the Social and Cultural patterns of conduct of men and women, with a view to achievingn the elimination of prejudices and customary and all other practices which are based on the idea of the inferiority or the superiority of either of the sexes or on stereotyped roles for men and women؛ ↑&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
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			<content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;</p>
<div id="story" class="story" data-id="1557163052" data-words="970">
<div>
<ul>
<li>. محمدجعفر جعفری لنگرودی، مقدمه عمومی علم حقوق، تهران، گنج دانش، ۱۳۷۱، ص ۱۵٫ ↑</li>
</ul>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. محمد معین، فرهنگ فارسی معین، بی‌نا، ۱۳۸۲٫ ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. عبدالکریم بی‌آزار شیرازی، رساله نوین، ج ۳، دفتر نشر فرهنگ اسلامی، ۱۳۶۴، ص ۱۸٫ ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<ol>
<li>. حسن حیدرى، یوسف ابراهیمى نسب، جایگاه زن در گذر تاریخ و سیرى در حقوق آن، ‌فصل‌نامه علمى پژوهشى زن و فرهنگ/ سال دوم. شماره پنجم. پاییز ۱۳۸۹، صص ۷۵تا ۸۰ ↑</li>
</ol>
</ol>
<p><img src="https://ziso.ir/wp-content/uploads/2022/11/pics_24_50.png" /></p>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. حسن صدر، حقوق زن در اسلام و اروپا، سازمان انتشارات جاویدان، ۱۳۲۷، ص ۳۱٫ ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. همان منبع، ص ۴۹٫ ↑</li>
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</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. یحیی نوری، جاهلیت و اسلام، بنیاد علمی و اسلامی مدرسه الشهدا، ۱۳۶۰، ص ۶۰۴٫ ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. مرتضی مطهری، نظام حقوق زن در اسلام، پیشین، ص ۱۴۳تا۱۴۵٫ ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. ناصر مکارم شیرازی و دیگران، تفسیر نمونه، دارالکتب‌الاسلامیه، ج ۲، ۱۳۵۳، ص ۱۱۰٫ ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. سوره روم، آیه ۲۱٫ ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. محمود طلوعى، فرهنگ جامع سیاسى، تهران، نشر سخن، ۱۳۷۲، ص ۷۰۳ و ۷۷۹؛ عبدالرسول بیات، فرهنگ واژه‏ ها، مؤسسه اندیشه و فرهنگ دینى، ۱۳۸۱، ص ۲۹۰٫ ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. پاملا آبوت، والاس کلر، «تولید دانش فمینیستی». در جامعه‌شناسی زنان. ترجمهٔ منیژه نجم‌عراقی. چاپ چاپ چهارم. تهران: نشر نی، ۱۳۸۵. ۲۹۳ تا ۲۹۷. ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. مگی هام، فرهنگ نظریه های فمینیستی، ترجمه نوشین احمدی خراسانی، فیروزه مهاجر، فرخ قره‌داغی، تهران: انتشارات توسعه،. ۱۳۸۲، ص۴۱۹٫آلیسون وایلی، فمینیسم و علوم اجتماعی، ترجمه عباس یزدانی، مجموعه مقالات فمینیسم و دانش‌های فمینیستی، قم: دفتر مطالعات و تحقیقات زنان،. ۱۳۸۲، ص ۴۱۸٫عزازی، شهلا، فمینیسم و دیدگاه‌ها، تهران: انتشارات روشنگران، ۱۳۸۵، ص۱۷٫ ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. قاسم شعبانی، حقوق اساسی و ساختار حکومت جمهوری اسلامی ایران، چ ۴۶، انتشارات اطلاعات، ۱۳۹۱، ص ۹۸ -۹۹٫ ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. زهرا آیت‌اللهی، زنان – وضع حقوقی و قوانین – ایران، شورای فرهنگی اجتماعی زنان، روابط عمومی، ۱۳۹۲٫ ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. ناصر کاتوزیان، حقوق مدنی خانواده، جلد اول، چاپ پنجم، حقوق مدنی، خانواده ۲، نشر میزان، ۱۳۷۸٫ ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. اسماعیل ساولانی، حقوق جزای عمومی، منطبق با قانون مجازات اسلامی مصوب ۱۳۹۲، چاپ سوم، انتشارات دادآفرین، ۱۳۹۲٫ ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. حسین مهرپور، حقوق بشر در اسناد بین‌المللی و موضع جمهوری اسلامی ایران، چاپ دوم، انتشارات اطلاعات، تهران، ۱۳۸۶، صص ۳۳۰-۳۳۶٫ ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. کمال مصطفی پور، حقوق زنان، اسناد بین‌المللی، موضع ایران، منتشر شده در پایگاه نشر مقالات حقوقی، حق گستر، کارشناس ارشد حقوق بشر«دانشگاه شهید بهشتی»، ۱۳۹۰٫ ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. Conde, H. Victor, A Handbook of International Human Rights Terminology, santa Barbara C A: ABC- Clio, 2002, second Edition, p. 127. ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. Ibid , p. 128 ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. محمد قاری سید فاطمی، حقوق بشر در جهان معاصر، مرکز چاپ و انتشارات دانشگاه شهید بهشتی، ۱۳۸۲، تهران، صص ۱۹۰-۱۹۱٫ ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. Universal Declaration of Human Rights, UN, G. A. Res. No 217 A (III) on 10Dec. 1948 ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. محمد قاری سید فاطمی، پیشین، ص ۱۹۲٫ ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. Covenant ↑</li>
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</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. Convention ↑</li>
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</li>
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<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. Treaty ↑</li>
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</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. Declarations ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. International Covenant on Economic, Social and Cultural Rights, UN, G. A. Res. No 2200A (XXI) of 16 Dec. 1966. ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. International Covenant on Civil and political Rights, UN, G. A. , Res. No 2200A (XXI) of 16 Dec. 1966. ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. Convention on the prevention and punishment of the crime of Genocide , UN, G. A. , Res. 260A (III) of 9 Dec. 1948. ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. International Convention on the Elimination of all Forms of Racial Discrimination , UN, G. A. , Res. 2106 (XX) of 21 Dec. 1965. ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. Convention Against Torture and other Cruel , inhuman or Degrading treatment or punishment , UN, G. A. , Res. 39/46 of Dec. 1984. ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. Convention on the Elimination of all Forms of Discrimination Against women , UN, G. A. , Res. 34/180 of 18 Dec. 1979. ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. Convention on the Elimination the Rights of the child , UN, G. A. , Res. 44/25 of 20 Nov. 1989. ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. Declaration on of all Forms of Intolerance and of Discrimination Based on Religion or Belief, UN, G. A. , Res. 36/55 of 25 November. 1981. ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. Declaration on the Elimination of Violence Against women (1994). ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. Declaration on the Rights of persons Belonging to National or Ethnic, Religious and linguistic Minorities (1992). ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. جهت آشنایی بیشتر با این اسناد و دستیابی به متون کامل مربوطه می­توانید به منابع زیر مراجعه کنید: حسین مهرپور، نظام بین‌المللی حقوق بشر، انتشارات اطلاعات، تهران، ۱۳۸۳، چاپ دوم، صص ۳۶-۱۵۰٫ ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. جمشید شریفیان، راهبرد جمهوری اسلامی ایران در زمینه حقوق بشر در سازمان ملل متحد، چاپ اول، مرکز چاپ و انتشارات وزارت امور خارجه، تهران، ۱۳۸۰، صص ۹۸-۱۴۹٫ ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. (art. 1)3, see: cun ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. see: UDHR(1948) ART3-21 ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. SEE: UDHR(1948) ART 29 ↑</li>
</ol>
</li>
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<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. UN DOC. ALRES. /44/128. ↑</li>
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</li>
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<p> </p>
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<li>
<ol>
<li>. برگرفته از سایت صدا و سیما. ↑</li>
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</li>
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<p> </p>
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<ol>
<li>. برگرفته از سایت صدا و سیما. ↑</li>
</ol>
</li>
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<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. Atticle 15-1 states parties shall accord to women equality with men before the law. ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. میترا باقریان، بررسی ویژگی‌های اشتغال زنان در ایران، تهران، سازمان برنامه و بودجه، ۱۳۶۹، صص۲، ۱ ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. عزت الله عراقی، حقوق بین‌المللی کار، تهران، انتشارات دانشگاه تهران، ۱۳۶۷ صص ۴۲۴و ۴۲۳٫ ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. نسرین جزنی، بررسی موانع و مشکلات موجود در اشتغال زنان در بخش‌های دولتی، ت‍ه‍ران‌، ش‍رک‍ت‌ ان‍ت‍ش‍ارات‌ س‍وره‌ م‍ه‍ر، ۱۳۸۳، ص ۱۳٫ ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. محمدرضا علویون، کار زنان در حقوق ایران و حقوق بین‌المللی کار، تهران، انتشارات روشنگران و مطالعات زنان، ۱۳۸۴، صص ۲۳و۲۲٫ ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. کار، مهرانگیز، رفع تبعیض از زنان ؛ مقایسه کنوانسیون رفع تبعیض از زنان با قوانین داخلی ایران، تهران، نشر قطره، ۱۳۷۹، چاپ سوم، ص ۲۶۵ ↑</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p> </p>
<ol>
<li>
<ol>
<li>. Article 5-States Parties shall take all appropriate measures(a) To Modify the Social and Cultural patterns of conduct of men and women, with a view to achievingn the elimination of prejudices and customary and all other practices which are based on the idea of the inferiority or the superiority of either of the sexes or on stereotyped roles for men and women؛ ↑</li>
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<p>&#8220;</p><div class="item_footer"><p><small><a href="https://mel.kowsarblog.ir/دانلود-پایان-نامه-های-آماده-n-قسمت-29-nn3">مطلب اصلی</a> در <a href="http://kowsarblog.ir/">کوثربلاگ </a>ارسال شده است.</small></p></div>]]></content:encoded>
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			<title>&#34; دانلود مقاله-پروژه و پایان نامه | ۲-۶-۱۰حق محاکمه در حضور هیات منصفه – 5 &#34;</title>
			<link>https://mel.kowsarblog.ir/دانلود-مقاله-پروژه-و-پایان-نامه-۲-۶-۱۰حق-محاکمه-در-حضور-هیات-منصفه-nn5</link>
			<pubDate>15:54:00 +0330 دوشنبه، 21 آذر 1401</pubDate>			<dc:creator>نویسنده محمدی</dc:creator>
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&lt;div&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;حق برخورداری از مترجم&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;مطابق اصل سرزمینی بودن جرایم هر کشوری در حوزه صلاحیت ملی خود حق اعمال قوانین مصوب خود را دارا است.‌بنابرین‏ ممکن است ارتکاب بزه توسط یک شخص بیگانه انجام شود و رسیدگی به اتهام او در یک دادگاه که وی به زبان آن آشنا نیست انجام شود.در واقع بدون آنکه متهم زبان مقامات اجرایی و قضایی را بداند کل فرایند دادرسی کیفری و عادلانه بودن آن با تردید جدی روبروست.در واقع ابزارهایی مانند حق دانستن متهم از علت بازداشت خود،تفهیم اتهام،حق دفاع به طور کلی و… مستلزم آن است که متهم زبان داگاه و شاکی را متوجه شود.این امر ممکن است که کشورهایی که به چند زبان در آن تکلم می شود نیز موضوعیت پیدا کند یا چنانچه قبلا گفتیم در خصوص اشخاص بیگانه ای که در یک کشور به صورت دائم یا موقت حضور دارند این موضوع مطرح گردد.در هر حال متهم باید زبان دادگاه و شاکی و وکیل وی را بداند و اگر نداند باید به صورت رایگان برای وی امکاناتی فراهم گردد که متوجه جریان رسیدگی به طور کامل گردد.در غیر این صورت صحبت از رسیدگی عادلانه در کل فرایند دارسی عادلانه بی معنی خواهد بود.این حق در حقوق ایران و در بسیاری از اسناد بین‌المللی مورد قبول واقع شده است که به آن خواهیم پرداخت.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;img src=&quot;https://ziso.ir/wp-content/uploads/2022/11/pics_9_50.png&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://shivadanesh.ir/&quot;&gt; &lt;img src=&quot;https://ziso.ir/wp-content/uploads/2021/10/THESIS-PAPER-11.png&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;از دیدگاه حقوق تطبیقی حق استفاده از مترجم در ماده ۱۲۰ و ۱۲۱ قانون جدید آیین دادرسی کیفری فرانسه نیز پیش‌بینی شده است.علاوه بر آن ماده ۱۲۱ ‌در مورد افراد ناشنوا نیز تمهیداتی را پیش‌بینی ‌کرده‌است.در این ماده آمده است:&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;«اگر شخص تحت بررسی یعنی متهم ناشنواست بازپرس راسا برای مساعدت او در هنگام تحقیقات مترجمی که به زبان اشارات آشناست یا هر شخص صلاحیتداری که به زبان یا شیوه ای تسط دارد که اجازه ارتباط برقرار کردن با ناشنوایان را می‌دهد،به خدمت می‌گیرد.اگر این شخص قسم نخورده باشد سوگند یاد می‌کند که در همکاری خود با دادگستری بر اساس شرافت و وجدان خود عمل نماید.بازپرس همچنین می‌تواند به هر وسیله فنی که اجازه ارتباط با شخص تحت بررسی را می‌دهد متوسل شود .اگر شخص تحت بررسی بتواند بخواند و بنویسد،بازپرس همچنین می‌تواند از طریق کتابت با او ارتباط برقرار کند.»&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;۲-۶-۱۰حق محاکمه در حضور هیات منصفه&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;هیات منصفه نهادی است که در کشورهای ملهم از حقوق انگلوساکسون برای رسیدگی به جرایم مهم مورد استفاده قرار می‌گیرد.وظیفه اصلی هیات منصفه پاسخ به دو سوال است.آیا عمل ارتکابی آن قدر شدید بوده که منجر به وقوع جرم شود.؟در صورت ارتکاب جرم آیا متهم مستحق استفاده از کیفیات مخففه می‌باشد یا خیر.در نهایت این قاضی است که میزان مجازات را مشخص می‌کند و هیات منصفه به عنوان یکی از اصول دادرسی عادلانه برای تشکیلات دادگستری است.&lt;sup&gt;[۷۰]&lt;/sup&gt;به نظر علمای دادرسی حضور هیات منصفه به عنوان گروهی که از متن جامعه به عرصه قضاوت می‌آیند موجب تقویت و حمایت هر چه بیشتر نظارت و مشارکت مردمی در حفظ و حراست از حقوق و آزادیهای اساسی اشخاص در طول محاکمات جزایی محسوب می شود.حضور هیات منصفه در جریان رسیدگی به جرایم مطبوعاتی و سیاسی تضمین قابل توجهی در حفظ حقوق دفاعی متهمان به جرایم فوق الذکر محسوب می شود.&lt;sup&gt;[۷۱]&lt;/sup&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;طرفداران هیات منصفه معتقدند خشکی و نارسایی قوانین از یک سو،علاقه و دلبستگی وافری که دادرسان در طول مدت به اجرای متون قوانین و ظواهر مواد قانونی پیدا می‌کنند از سوی دیگر موجب می شود که در برخی موارد حکم قانون با حکم وجدان عمومی جامعه منطبق نباشد و مقتضیات عدالت و انصاف شاید و باید رعایت شود و لذا باید به متهم فرصت داده شود که در برخی از جرایم مانند جرایم سیاسی و مطبوعاتی که بیش از سایر جرایم با افکار و احساسات عمومی در ارتباط هستند از هیات منصفه که منعکس کننده وجدان عمومی است استمداد شود و در نتیجه قوانین خشک و بی روح با مقتضیات عدالت و انصاف متناسب گردد.سابقه استفاده از هیات منصفه در دادرسی ها به یونان باستان می‌رسد .گفته شده است در محاکمه معروف سقراط ۵۰۱ نفر به عنوان اعضای هیات منصفه رأی‌ دادند و سقراط را به اتهام تبلیغ علیه حکومت به نوشیدن جام شوکران محکوم کردند.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;«هیات منصفه به شکل امروزی آن از حقوق انگلستان اقتباس شده است.این نهاد بعد از فتح انگلستان توسط نورمن ها در قرن یازدهم میلادی رایج گردید و از آنجا به سایر نقاط جهان راه یافت»در گذشته در برخی از کشورها مانند انگلستان حضور هیات منصفه در دعاوی مدنی نیز متداول بود ولی امروزه این قاعده بیشتر در جرایم سیاسی و مطبوعاتی لحاظ می شود.»&lt;sup&gt;[۷۲]&lt;/sup&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;۲-۷-حقوق پس از دادرسی&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;۲-۷-۱-حق تجدید نظر خواهی&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;حق تجدید نظر خواهی به منظور تضمین حداقل دو مرحله از رسیدگی قضایی در پرونده است و ثانیاً ‌به این دلیل که پرونده باید نزد محکمه بالاتری مطرح شود.این امر در میان مطالب دیگر ‌به این معنا است که در رسیدگی ها تجدید نظر فقط محدود به رسیدگی موضوعات قانونی مطرح شده ای است که به واسطه رأی‌ در مرحله اول ممکن است همیشه با آن معیار مواجه نشود.رسیدگی های تجدید نظر خواهی باید به موقع باشند اثر فوری اعمال حق تجدید نظر خواهی این است که دادگاه باید اجرای حکم صادره در مرحله بدوی را متوقف نماید.این اصل باید اعمال شود مگر در مواردی که شخص محکوم به طور ارادی بپذیرد که مجازات باید ابتداء اجرا شود.حق تجدید نظر خواهی به همه محکومین صرف نظر از شدت جرم یا مجازات اعلام شده و به مرحله بدوی تعلق دارد.تضمینات دادرسی منصفانه باید در همه مراحل دادرسی مشهود و بارز باشند.&lt;sup&gt;[۷۳]&lt;/sup&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;تجدید نظر روشی است که در پرتو آن امکان بازبینی آرای قضایی فراهم آمده و اعمال ضابطه مند آن اجرای عدالت و احراز واقع را بیش از پیش ممکن می‌سازد.با وجود خطا پذیری انسان تجدید نظر امری کاملا ضروری است .به طور کلی تجدید نظر در معنای عام هر روشی است که در پرتو آن محکوم علیه شاکی یا دادستان می‌تواند به رأی‌ غیر قطعی و نهایی صادره از یک مرجع قضایی اعتراض کند ویک دادگاه صلاحیت دار ملزم می شود که این اعتراض را مورد رسیدگی قرار داده و ‌در مورد آن رأی‌ صادر کند&lt;sup&gt;[۷۴]&lt;/sup&gt;&lt;/p&gt;
&lt;/div&gt;
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&lt;p&gt;&amp;#8220;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;item_footer&quot;&gt;&lt;p&gt;&lt;small&gt;&lt;a href=&quot;https://mel.kowsarblog.ir/دانلود-مقاله-پروژه-و-پایان-نامه-۲-۶-۱۰حق-محاکمه-در-حضور-هیات-منصفه-nn5&quot;&gt;مطلب اصلی&lt;/a&gt; در &lt;a href=&quot;http://kowsarblog.ir/&quot;&gt;کوثربلاگ &lt;/a&gt;ارسال شده است.&lt;/small&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;</description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;</p>
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<p> </p>
<p><strong>حق برخورداری از مترجم</strong></p>
<p> </p>
<p>مطابق اصل سرزمینی بودن جرایم هر کشوری در حوزه صلاحیت ملی خود حق اعمال قوانین مصوب خود را دارا است.‌بنابرین‏ ممکن است ارتکاب بزه توسط یک شخص بیگانه انجام شود و رسیدگی به اتهام او در یک دادگاه که وی به زبان آن آشنا نیست انجام شود.در واقع بدون آنکه متهم زبان مقامات اجرایی و قضایی را بداند کل فرایند دادرسی کیفری و عادلانه بودن آن با تردید جدی روبروست.در واقع ابزارهایی مانند حق دانستن متهم از علت بازداشت خود،تفهیم اتهام،حق دفاع به طور کلی و… مستلزم آن است که متهم زبان داگاه و شاکی را متوجه شود.این امر ممکن است که کشورهایی که به چند زبان در آن تکلم می شود نیز موضوعیت پیدا کند یا چنانچه قبلا گفتیم در خصوص اشخاص بیگانه ای که در یک کشور به صورت دائم یا موقت حضور دارند این موضوع مطرح گردد.در هر حال متهم باید زبان دادگاه و شاکی و وکیل وی را بداند و اگر نداند باید به صورت رایگان برای وی امکاناتی فراهم گردد که متوجه جریان رسیدگی به طور کامل گردد.در غیر این صورت صحبت از رسیدگی عادلانه در کل فرایند دارسی عادلانه بی معنی خواهد بود.این حق در حقوق ایران و در بسیاری از اسناد بین‌المللی مورد قبول واقع شده است که به آن خواهیم پرداخت.</p>
<p><img src="https://ziso.ir/wp-content/uploads/2022/11/pics_9_50.png" /></p>
<p><a href="https://shivadanesh.ir/"> <img src="https://ziso.ir/wp-content/uploads/2021/10/THESIS-PAPER-11.png" /></a></p>
<p> </p>
<p>از دیدگاه حقوق تطبیقی حق استفاده از مترجم در ماده ۱۲۰ و ۱۲۱ قانون جدید آیین دادرسی کیفری فرانسه نیز پیش‌بینی شده است.علاوه بر آن ماده ۱۲۱ ‌در مورد افراد ناشنوا نیز تمهیداتی را پیش‌بینی ‌کرده‌است.در این ماده آمده است:</p>
<p> </p>
<p>«اگر شخص تحت بررسی یعنی متهم ناشنواست بازپرس راسا برای مساعدت او در هنگام تحقیقات مترجمی که به زبان اشارات آشناست یا هر شخص صلاحیتداری که به زبان یا شیوه ای تسط دارد که اجازه ارتباط برقرار کردن با ناشنوایان را می‌دهد،به خدمت می‌گیرد.اگر این شخص قسم نخورده باشد سوگند یاد می‌کند که در همکاری خود با دادگستری بر اساس شرافت و وجدان خود عمل نماید.بازپرس همچنین می‌تواند به هر وسیله فنی که اجازه ارتباط با شخص تحت بررسی را می‌دهد متوسل شود .اگر شخص تحت بررسی بتواند بخواند و بنویسد،بازپرس همچنین می‌تواند از طریق کتابت با او ارتباط برقرار کند.»</p>
<p> </p>
<p><strong>۲-۶-۱۰حق محاکمه در حضور هیات منصفه</strong></p>
<p> </p>
<p>هیات منصفه نهادی است که در کشورهای ملهم از حقوق انگلوساکسون برای رسیدگی به جرایم مهم مورد استفاده قرار می‌گیرد.وظیفه اصلی هیات منصفه پاسخ به دو سوال است.آیا عمل ارتکابی آن قدر شدید بوده که منجر به وقوع جرم شود.؟در صورت ارتکاب جرم آیا متهم مستحق استفاده از کیفیات مخففه می‌باشد یا خیر.در نهایت این قاضی است که میزان مجازات را مشخص می‌کند و هیات منصفه به عنوان یکی از اصول دادرسی عادلانه برای تشکیلات دادگستری است.<sup>[۷۰]</sup>به نظر علمای دادرسی حضور هیات منصفه به عنوان گروهی که از متن جامعه به عرصه قضاوت می‌آیند موجب تقویت و حمایت هر چه بیشتر نظارت و مشارکت مردمی در حفظ و حراست از حقوق و آزادیهای اساسی اشخاص در طول محاکمات جزایی محسوب می شود.حضور هیات منصفه در جریان رسیدگی به جرایم مطبوعاتی و سیاسی تضمین قابل توجهی در حفظ حقوق دفاعی متهمان به جرایم فوق الذکر محسوب می شود.<sup>[۷۱]</sup></p>
<p> </p>
<p>طرفداران هیات منصفه معتقدند خشکی و نارسایی قوانین از یک سو،علاقه و دلبستگی وافری که دادرسان در طول مدت به اجرای متون قوانین و ظواهر مواد قانونی پیدا می‌کنند از سوی دیگر موجب می شود که در برخی موارد حکم قانون با حکم وجدان عمومی جامعه منطبق نباشد و مقتضیات عدالت و انصاف شاید و باید رعایت شود و لذا باید به متهم فرصت داده شود که در برخی از جرایم مانند جرایم سیاسی و مطبوعاتی که بیش از سایر جرایم با افکار و احساسات عمومی در ارتباط هستند از هیات منصفه که منعکس کننده وجدان عمومی است استمداد شود و در نتیجه قوانین خشک و بی روح با مقتضیات عدالت و انصاف متناسب گردد.سابقه استفاده از هیات منصفه در دادرسی ها به یونان باستان می‌رسد .گفته شده است در محاکمه معروف سقراط ۵۰۱ نفر به عنوان اعضای هیات منصفه رأی‌ دادند و سقراط را به اتهام تبلیغ علیه حکومت به نوشیدن جام شوکران محکوم کردند.</p>
<p> </p>
<p>«هیات منصفه به شکل امروزی آن از حقوق انگلستان اقتباس شده است.این نهاد بعد از فتح انگلستان توسط نورمن ها در قرن یازدهم میلادی رایج گردید و از آنجا به سایر نقاط جهان راه یافت»در گذشته در برخی از کشورها مانند انگلستان حضور هیات منصفه در دعاوی مدنی نیز متداول بود ولی امروزه این قاعده بیشتر در جرایم سیاسی و مطبوعاتی لحاظ می شود.»<sup>[۷۲]</sup></p>
<p> </p>
<p><strong>۲-۷-حقوق پس از دادرسی</strong></p>
<p> </p>
<p><strong>۲-۷-۱-حق تجدید نظر خواهی</strong></p>
<p> </p>
<p>حق تجدید نظر خواهی به منظور تضمین حداقل دو مرحله از رسیدگی قضایی در پرونده است و ثانیاً ‌به این دلیل که پرونده باید نزد محکمه بالاتری مطرح شود.این امر در میان مطالب دیگر ‌به این معنا است که در رسیدگی ها تجدید نظر فقط محدود به رسیدگی موضوعات قانونی مطرح شده ای است که به واسطه رأی‌ در مرحله اول ممکن است همیشه با آن معیار مواجه نشود.رسیدگی های تجدید نظر خواهی باید به موقع باشند اثر فوری اعمال حق تجدید نظر خواهی این است که دادگاه باید اجرای حکم صادره در مرحله بدوی را متوقف نماید.این اصل باید اعمال شود مگر در مواردی که شخص محکوم به طور ارادی بپذیرد که مجازات باید ابتداء اجرا شود.حق تجدید نظر خواهی به همه محکومین صرف نظر از شدت جرم یا مجازات اعلام شده و به مرحله بدوی تعلق دارد.تضمینات دادرسی منصفانه باید در همه مراحل دادرسی مشهود و بارز باشند.<sup>[۷۳]</sup></p>
<p> </p>
<p>تجدید نظر روشی است که در پرتو آن امکان بازبینی آرای قضایی فراهم آمده و اعمال ضابطه مند آن اجرای عدالت و احراز واقع را بیش از پیش ممکن می‌سازد.با وجود خطا پذیری انسان تجدید نظر امری کاملا ضروری است .به طور کلی تجدید نظر در معنای عام هر روشی است که در پرتو آن محکوم علیه شاکی یا دادستان می‌تواند به رأی‌ غیر قطعی و نهایی صادره از یک مرجع قضایی اعتراض کند ویک دادگاه صلاحیت دار ملزم می شود که این اعتراض را مورد رسیدگی قرار داده و ‌در مورد آن رأی‌ صادر کند<sup>[۷۴]</sup></p>
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<p>&#8220;</p><div class="item_footer"><p><small><a href="https://mel.kowsarblog.ir/دانلود-مقاله-پروژه-و-پایان-نامه-۲-۶-۱۰حق-محاکمه-در-حضور-هیات-منصفه-nn5">مطلب اصلی</a> در <a href="http://kowsarblog.ir/">کوثربلاگ </a>ارسال شده است.</small></p></div>]]></content:encoded>
								<comments>https://mel.kowsarblog.ir/دانلود-مقاله-پروژه-و-پایان-نامه-۲-۶-۱۰حق-محاکمه-در-حضور-هیات-منصفه-nn5#comments</comments>
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			<title>&#34; مقاله های علمی- دانشگاهی – خودکارآمدی به عنوان یک منبع روانشناختی توسعه پذیر و قابل یادگیری – 1 &#34;</title>
			<link>https://mel.kowsarblog.ir/مقاله-های-علمی-دانشگاهی-n-خودکارآمدی-به-عنوان-یک-منبع-روانشناختی-توسعه-پذیر-و-قابل</link>
			<pubDate>14:42:00 +0330 دوشنبه، 21 آذر 1401</pubDate>			<dc:creator>نویسنده محمدی</dc:creator>
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&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
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&lt;li&gt;رویکرد مبتنی بر خود: مثل اعتماد و فروتنی&lt;/li&gt;
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&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
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&lt;li&gt;رویکرد میان فردی: مثل گذشت، حق شناسی و همدلی&lt;/li&gt;
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&lt;li&gt;رویکرد زیست شناختی: مثل نیرو و توانایی&lt;/li&gt;
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&lt;li&gt;رویکردهای انطباقی: مثل خوش خلقی، تفکر و تأمل، معنویت&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;
&lt;p&gt;طبقه بندی پترسون و سلیگمن یک سیستم طبقه بندی بهتری برای ایجاد رشته ای مثل روانشناسی مثبت به شمار می‌آید. اما این نکته هم باید در نظر داشته باشیم که نبایستی هیچ سیستم طبقه بندی برای صفات و ویژگی های روانشناختی به صورت جامع و کامل در نظر بگیریم (سلیگمن، ۲۰۰۳؛ ۱۲۶).&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;img src=&quot;https://ziso.ir/wp-content/uploads/2022/11/pics_9_50-1.png&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://feko.ir/&quot;&gt; &lt;img src=&quot;https://ziso.ir/wp-content/uploads/2021/10/S-10.png&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;۸-۳-۲٫ معیارهای رفتار سازمانی مثبت&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;به دلیل حمایت روانشناسی مثبت، رفتار سازمانی مثبت تنها رویکرد مثبت گرا به مطالعات سازمانی نیست و بدین ترتیب شناسایی ویژگی های متمایز منحصر به فرد آن مهم می‌باشد. لوتانز اولین تعریف را در سال ۲۰۰۲ از رفتار سازمانی مثبت ارائه کرد. او رفتار سازمانی مثبت را به عنوان مطالعه و کاربرد نقاط مثبت گرای منابع انسانی و ظرفیت های روانشناختی که می‌توانند ارزیابی و توسعه یابند و برای بهبود عملکرد در محیط های کاری امروزی به طور مؤثری مدیریت گردند، تعریف می‌کند. به طور خاص برای اینکه ظرفیت های روانشناختی مثبت شرایط ورود به رفتار سازمانی مثبت را داشته باشند بایستی مثبت باشند و دارای تئوری های گسترده، تحقیقات بنیادی و ارزیابی های معتبر و پایا باشند (لوتانز،۲۰۰۲ ؛ ۲۹۶).&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;‌بنابرین‏ آن ها همان‌ طور که گفتیم باید توسعه پذیر باشند یعنی برای توسعه باز و برای بهبود عملکرد قابل مدیریت باشند. نهایتاًً حالت های مثبت که معرف معیارهای رفتار سازمانی مثبت هستند، عمدتاًً ‌در مورد آن ها در سطح فردی و خرد تحقیق و اندازه گیری شده و توسعه یافته اند. در این مورد می توان مؤسسه‌ کالوپ را نام برد که تحقیقات وسیعی در این زمینه انجام داده است. معیارهای رفتار سازمانی مثبت توسعه پذیر و قابل یادگیری هستند و از رویکردهای مثبت دیگر که روی صفات و ویژگی های مثبت متمرکز اند تمیز داده شده اند. این معیارها عبارتند از: خودکارآمدی، امید، تاب آوری و خوش بینی و هنگامی که آن ها در یک سازه مرکزی جمع شوند عامل مرتبه بالایی به نام سرمایه روانشناختی به وجود می آورند (لوتانز و همکاران، ۲۰۰۷ ؛ ۱۱).&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;۹-۳-۲٫ ابعاد سرمایه روانشناختی&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;خودکارآمدی به عنوان یک منبع روانشناختی توسعه پذیر و قابل یادگیری&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;بر طبق تئوری شناخت اجتماعی بندورا و تحقیقات گسترده استاجکوویک و لوتانز، خودکارآمدی در محیط کار به عنوان اعتماد راسخ یا اطمینان فرد به توانایی هایش در بسیج انگیزه ها، منابع شناختی و دنبال کردن اعمالی که نیاز دارد تا وظایف خاصی را درون یک بافت معینی اجرا کند، تعریف می شود. در بین معیارهای رفتار سازمانی مثبت خودکارآمدی بهترین و مناسب ترین معیار نسبت به بقیه معیارهاست. عوامل چندی که خودکارآمدی را منحصر به فردتر از بقیه می‌کند و به طور خاص با رفتار سازمانی مثبت مرتبط می‌سازد این است که اولاً خودکارآمدی دارای پایه تئوریکی و تحقیقات گسترده تری نسبت به بقیه معیارهاست، ثانیاًً اینکه بقیه معیارها هم به عنوان یک حالت موقتی (State)و هم به عنوان یک صفت ثابت (Trait) روی آن ها تحقیق و آزمون شده است اما خودکارآمدی فقط به عنوان یک حالت در نظر گرفته شده است (مارر و پیرس، ۱۹۹۸). خودکارآمدی نه تنها دارای ماهیت قابل توسعه بودن در هر زمان است بلکه به گونه ای منحصر به فرد است. داشتن کارآمدی در حوزه فردی لزوماًً قابل انتقال به حوزه های دیگر نیست، در حقیقت فقدان کارآمدی در بافت های بسیاری مانع مؤثر بودن دیگران نمی شود (بندورا&lt;sup&gt;[۶۰]&lt;/sup&gt;، ۱۹۹۷، به نقل از لوتانز و دیگران، ۲۰۰۶؛ ۳۸۷).&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ثالثاً ارتباط بین خودکارآمدی و بسیاری از ابعاد عملکرد مرتبط با محیط کار آزمون شده است مثل رابطه خودکارآمدی با نگرش به کار از دید فرهنگ سازمانی، رهبری اثربخش تصمیم گیری های اخلاقی، خلاقیت، مشارکت، تصمیم گیری های حرفه ای و کارآفرینی (لوتانز و یوسف، ۲۰۰۷؛ ۳۲۳). همچنین یافته های فرا تحلیلی از ارتباط بین خودکارآمدی و عملکردهای مرتبط با کار حمایت می‌کنند&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;در ارتباط با اطمینان، خودکارآمدی با اصطلاحاتی از قبیل تعیین اهداف چالشی برای خود، خودگزینی&lt;sup&gt;[۶۱]&lt;/sup&gt; در هنگام انجام وظایف سخت، خودانگیختگی&lt;sup&gt;[۶۲]&lt;/sup&gt;، تلاش زیاد برای سرمایه گذاری و حرکت به سمت اجرای وظایف و اهداف و استقامت هنگام مواجه با موانع همراه است.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;افرادی که دارای اعتماد کمتری هستند منفعلانه به چالش هایی که توسط محیط خارجی شان بر آن ها تحمیل می شود پاسخ می‌دهند که نتیجتاً این افراد غیرکارآ بیشتر در معرض شکست، ناامیدی و چالش هایی که خود می آفرینند مثل عدم اعتماد به نفس، شکاکی، ادراکات و اسنادات منفی قرار می گیرند (بندورا و لاک، ۲۰۰۳ ؛۸۷).&lt;/p&gt;
&lt;p&gt; &lt;/p&gt;
&lt;p&gt;از طرف دیگر افرادی که دارای اطمینان بیشتری هستند ظرفیت های شناختی مثل نشان پردازی&lt;sup&gt;[۶۳]&lt;/sup&gt;، دوراندیشی&lt;sup&gt;[۶۴]&lt;/sup&gt;، مشاهده&lt;sup&gt;[۶۵]&lt;/sup&gt;، خودتنظیمی&lt;sup&gt;[۶۶]&lt;/sup&gt; و درون اندیشی&lt;sup&gt;[۶۷]&lt;/sup&gt; را در راستای اجرای اهدافشان به کار می بندند. نشان پردازی به معنی ایجاد یک تصویر ذهنی از تولیدات، فرآیندها و پیامدهایی که مورد علاقه سهام‌داران و ذینفعان مهم سازمان است، می‌تواند برنامه ریزی اقتضایی، اولویت دهی&lt;sup&gt;[۶۸]&lt;/sup&gt; و خودانگیختگی را هنگامی که فرد به طور موقتی در یک حالت هیجانی فرو رفته را ارتقاء می‌دهد. مشاهده می‌تواند تسهیل کننده یادگیری از دیگران باشد و فرد وقت و انرژی خود را برای درگیر کردن خود با آزمون و خطا صرف کند. خود تنظیمی الزامات خویشتن داری و کنشگرایانه را برای اعتماد به نفس فراهم می آورد تا به رفتارهای بهره ورانه واقعی که منجر به رسیدن و اجرای اهداف می شود حتی هنگامی که انگیزنده های بیرونی وجود ندارند، جامه عمل بپوشاند و در نهایت درون اندیشی اثرات مثبت تجربیات گذشته را بر حسب درس های ارزشمندی که از گذشته فرا گرفته ایم را تقویت می‌کند و آن ها را در فرصت ها و تهدیدهای آینده به کار می بندیم.&lt;/p&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&amp;#8220;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;item_footer&quot;&gt;&lt;p&gt;&lt;small&gt;&lt;a href=&quot;https://mel.kowsarblog.ir/مقاله-های-علمی-دانشگاهی-n-خودکارآمدی-به-عنوان-یک-منبع-روانشناختی-توسعه-پذیر-و-قابل&quot;&gt;مطلب اصلی&lt;/a&gt; در &lt;a href=&quot;http://kowsarblog.ir/&quot;&gt;کوثربلاگ &lt;/a&gt;ارسال شده است.&lt;/small&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;</description>
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<li>رویکرد مبتنی بر خود: مثل اعتماد و فروتنی</li>
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<li>رویکرد میان فردی: مثل گذشت، حق شناسی و همدلی</li>
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<li>رویکرد زیست شناختی: مثل نیرو و توانایی</li>
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<li>رویکردهای انطباقی: مثل خوش خلقی، تفکر و تأمل، معنویت</li>
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<p>طبقه بندی پترسون و سلیگمن یک سیستم طبقه بندی بهتری برای ایجاد رشته ای مثل روانشناسی مثبت به شمار می‌آید. اما این نکته هم باید در نظر داشته باشیم که نبایستی هیچ سیستم طبقه بندی برای صفات و ویژگی های روانشناختی به صورت جامع و کامل در نظر بگیریم (سلیگمن، ۲۰۰۳؛ ۱۲۶).</p>
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<p><strong>۸-۳-۲٫ معیارهای رفتار سازمانی مثبت</strong></p>
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<p>به دلیل حمایت روانشناسی مثبت، رفتار سازمانی مثبت تنها رویکرد مثبت گرا به مطالعات سازمانی نیست و بدین ترتیب شناسایی ویژگی های متمایز منحصر به فرد آن مهم می‌باشد. لوتانز اولین تعریف را در سال ۲۰۰۲ از رفتار سازمانی مثبت ارائه کرد. او رفتار سازمانی مثبت را به عنوان مطالعه و کاربرد نقاط مثبت گرای منابع انسانی و ظرفیت های روانشناختی که می‌توانند ارزیابی و توسعه یابند و برای بهبود عملکرد در محیط های کاری امروزی به طور مؤثری مدیریت گردند، تعریف می‌کند. به طور خاص برای اینکه ظرفیت های روانشناختی مثبت شرایط ورود به رفتار سازمانی مثبت را داشته باشند بایستی مثبت باشند و دارای تئوری های گسترده، تحقیقات بنیادی و ارزیابی های معتبر و پایا باشند (لوتانز،۲۰۰۲ ؛ ۲۹۶).</p>
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<p>‌بنابرین‏ آن ها همان‌ طور که گفتیم باید توسعه پذیر باشند یعنی برای توسعه باز و برای بهبود عملکرد قابل مدیریت باشند. نهایتاًً حالت های مثبت که معرف معیارهای رفتار سازمانی مثبت هستند، عمدتاًً ‌در مورد آن ها در سطح فردی و خرد تحقیق و اندازه گیری شده و توسعه یافته اند. در این مورد می توان مؤسسه‌ کالوپ را نام برد که تحقیقات وسیعی در این زمینه انجام داده است. معیارهای رفتار سازمانی مثبت توسعه پذیر و قابل یادگیری هستند و از رویکردهای مثبت دیگر که روی صفات و ویژگی های مثبت متمرکز اند تمیز داده شده اند. این معیارها عبارتند از: خودکارآمدی، امید، تاب آوری و خوش بینی و هنگامی که آن ها در یک سازه مرکزی جمع شوند عامل مرتبه بالایی به نام سرمایه روانشناختی به وجود می آورند (لوتانز و همکاران، ۲۰۰۷ ؛ ۱۱).</p>
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<p><strong>۹-۳-۲٫ ابعاد سرمایه روانشناختی</strong></p>
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<p><strong>خودکارآمدی به عنوان یک منبع روانشناختی توسعه پذیر و قابل یادگیری</strong></p>
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<p>بر طبق تئوری شناخت اجتماعی بندورا و تحقیقات گسترده استاجکوویک و لوتانز، خودکارآمدی در محیط کار به عنوان اعتماد راسخ یا اطمینان فرد به توانایی هایش در بسیج انگیزه ها، منابع شناختی و دنبال کردن اعمالی که نیاز دارد تا وظایف خاصی را درون یک بافت معینی اجرا کند، تعریف می شود. در بین معیارهای رفتار سازمانی مثبت خودکارآمدی بهترین و مناسب ترین معیار نسبت به بقیه معیارهاست. عوامل چندی که خودکارآمدی را منحصر به فردتر از بقیه می‌کند و به طور خاص با رفتار سازمانی مثبت مرتبط می‌سازد این است که اولاً خودکارآمدی دارای پایه تئوریکی و تحقیقات گسترده تری نسبت به بقیه معیارهاست، ثانیاًً اینکه بقیه معیارها هم به عنوان یک حالت موقتی (State)و هم به عنوان یک صفت ثابت (Trait) روی آن ها تحقیق و آزمون شده است اما خودکارآمدی فقط به عنوان یک حالت در نظر گرفته شده است (مارر و پیرس، ۱۹۹۸). خودکارآمدی نه تنها دارای ماهیت قابل توسعه بودن در هر زمان است بلکه به گونه ای منحصر به فرد است. داشتن کارآمدی در حوزه فردی لزوماًً قابل انتقال به حوزه های دیگر نیست، در حقیقت فقدان کارآمدی در بافت های بسیاری مانع مؤثر بودن دیگران نمی شود (بندورا<sup>[۶۰]</sup>، ۱۹۹۷، به نقل از لوتانز و دیگران، ۲۰۰۶؛ ۳۸۷).</p>
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<p>ثالثاً ارتباط بین خودکارآمدی و بسیاری از ابعاد عملکرد مرتبط با محیط کار آزمون شده است مثل رابطه خودکارآمدی با نگرش به کار از دید فرهنگ سازمانی، رهبری اثربخش تصمیم گیری های اخلاقی، خلاقیت، مشارکت، تصمیم گیری های حرفه ای و کارآفرینی (لوتانز و یوسف، ۲۰۰۷؛ ۳۲۳). همچنین یافته های فرا تحلیلی از ارتباط بین خودکارآمدی و عملکردهای مرتبط با کار حمایت می‌کنند</p>
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<p>در ارتباط با اطمینان، خودکارآمدی با اصطلاحاتی از قبیل تعیین اهداف چالشی برای خود، خودگزینی<sup>[۶۱]</sup> در هنگام انجام وظایف سخت، خودانگیختگی<sup>[۶۲]</sup>، تلاش زیاد برای سرمایه گذاری و حرکت به سمت اجرای وظایف و اهداف و استقامت هنگام مواجه با موانع همراه است.</p>
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<p>افرادی که دارای اعتماد کمتری هستند منفعلانه به چالش هایی که توسط محیط خارجی شان بر آن ها تحمیل می شود پاسخ می‌دهند که نتیجتاً این افراد غیرکارآ بیشتر در معرض شکست، ناامیدی و چالش هایی که خود می آفرینند مثل عدم اعتماد به نفس، شکاکی، ادراکات و اسنادات منفی قرار می گیرند (بندورا و لاک، ۲۰۰۳ ؛۸۷).</p>
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<p>از طرف دیگر افرادی که دارای اطمینان بیشتری هستند ظرفیت های شناختی مثل نشان پردازی<sup>[۶۳]</sup>، دوراندیشی<sup>[۶۴]</sup>، مشاهده<sup>[۶۵]</sup>، خودتنظیمی<sup>[۶۶]</sup> و درون اندیشی<sup>[۶۷]</sup> را در راستای اجرای اهدافشان به کار می بندند. نشان پردازی به معنی ایجاد یک تصویر ذهنی از تولیدات، فرآیندها و پیامدهایی که مورد علاقه سهام‌داران و ذینفعان مهم سازمان است، می‌تواند برنامه ریزی اقتضایی، اولویت دهی<sup>[۶۸]</sup> و خودانگیختگی را هنگامی که فرد به طور موقتی در یک حالت هیجانی فرو رفته را ارتقاء می‌دهد. مشاهده می‌تواند تسهیل کننده یادگیری از دیگران باشد و فرد وقت و انرژی خود را برای درگیر کردن خود با آزمون و خطا صرف کند. خود تنظیمی الزامات خویشتن داری و کنشگرایانه را برای اعتماد به نفس فراهم می آورد تا به رفتارهای بهره ورانه واقعی که منجر به رسیدن و اجرای اهداف می شود حتی هنگامی که انگیزنده های بیرونی وجود ندارند، جامه عمل بپوشاند و در نهایت درون اندیشی اثرات مثبت تجربیات گذشته را بر حسب درس های ارزشمندی که از گذشته فرا گرفته ایم را تقویت می‌کند و آن ها را در فرصت ها و تهدیدهای آینده به کار می بندیم.</p>
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<p>&#8220;</p><div class="item_footer"><p><small><a href="https://mel.kowsarblog.ir/مقاله-های-علمی-دانشگاهی-n-خودکارآمدی-به-عنوان-یک-منبع-روانشناختی-توسعه-پذیر-و-قابل">مطلب اصلی</a> در <a href="http://kowsarblog.ir/">کوثربلاگ </a>ارسال شده است.</small></p></div>]]></content:encoded>
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